UAPA: पाकिस्तान से सीधे आतंकी फंडिंग के आरोप में लंबी हिरासत भर से जमानत नहीं- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक जेल में रहना (prolonged incarceration), जब अभियोजन का मामला कमजोर हो और वह केवल अप्रतिपुष्ट (uncorroborated) गवाह के बयान व सह-अभियुक्त के कबूलनामे पर आधारित हो, तो यह UAPA (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम, 1967) के तहत भी जमानत देने का आधार बन सकता है, भले ही धारा 43-D(5) की सख्त शर्तें लागू हों।
यह मामला उस अपील से जुड़ा था, जो एक आरोपी (A-13) ने NIA कोर्ट, जम्मू द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर की थी। आरोपी पर IPC की धारा 120-B, NDPS एक्ट की धाराएं 8/21 और UAPA की धाराएं 17, 18 और 20 के तहत आरोप थे।
जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की खंडपीठ ने कहा:
“केवल देरी निर्णायक नहीं हो सकती, लेकिन यदि अभियोजन का मामला कमजोर हो और आरोपी लंबे समय से जेल में हो, तो जमानत दी जा सकती है।”
पृष्ठभूमि
आरोपी को जून 2020 के एक मामले में A-13 के रूप में नामित किया गया था। उस पर 2003 से 2018 के बीच चरस की तस्करी और विभिन्न शहरों—मुंबई, दिल्ली, नासिक और अजमेर—में सप्लाई करने का आरोप था। वह 1 मार्च 2021 से हिरासत में था।
अभियोजन का मामला मुख्य रूप से एक एप्रूवर (सरकारी गवाह) के बयान, मोबाइल से मिले वॉइस क्लिप और चैट्स पर आधारित था। आरोपी से कोई बरामदगी नहीं हुई थी।
कोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि—
सह-अभियुक्त का कबूलनामा एक कमजोर साक्ष्य होता है और इसके आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
एप्रूवर का बयान भी बिना पुष्टिकरण के भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।
आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत, बरामदगी या वित्तीय लेन-देन का प्रमाण नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला अनुमान और सीमित सबूतों पर आधारित है और आरोपी की भूमिका भी स्पष्ट नहीं है।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष
कोर्ट ने कहा कि—
प्रथम दृष्टया आरोप साबित होने के पर्याप्त आधार नहीं हैं।
लंबे समय तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के खिलाफ है।
फैसला
हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को शर्तों के साथ जमानत देने का निर्देश दिया।