डोडा ईस्ट से AAP MLA महराज मलिक को राहत, हाईकोर्ट ने रद्द की निवारक हिरासत

Update: 2026-04-27 13:50 GMT

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने डोडा ईस्ट से विधायक महराज दीन मलिक की निवारक हिरासत (Preventive Detention) रद्द की। कोर्ट ने माना कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 (PSA) का इस्तेमाल उन आरोपों पर आधारित था, जो ज़्यादा से ज़्यादा 'कानून-व्यवस्था' (Law and Order) से जुड़े मामले थे और 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) के लिए ज़रूरी गंभीर खतरे की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिरासत में लेने वाला अधिकारी यह साबित करने में नाकाम रहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति (Detenu) के सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ काम करने की कोई आशंका थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि निवारक हिरासत का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक प्रक्रिया से बचने के लिए एक शॉर्टकट के तौर पर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट हिरासत में लिए गए व्यक्ति के पिता द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में डोडा के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा PSA की धारा 8(1)(a)(ii) के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश महराज मलिक को 'सार्वजनिक व्यवस्था' बनाए रखने के खिलाफ काम करने से रोकने के उद्देश्य से जारी किया गया।

विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी ने टिप्पणी की:

“कोर्ट की राय है कि ऐसी कोई आशंका नहीं थी कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति किसी भी तरह से 'सामाजिक अशांति' (Social Disorder) पैदा करने वाला कोई काम करेगा। याचिकाकर्ता/हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ कई FIRs में लगाए गए आरोप फिलहाल सक्षम अधिकारियों/अदालतों के समक्ष जांच/मुकदमे के अधीन हैं।”

हिरासत का यह आदेश 18 FIRs (जिनमें से कुछ 2014 की हैं, और तीन को वापस ले लिया गया या उनमें समझौता हो गया) और 16 दैनिक डायरी रिपोर्ट (DDRs) पर आधारित है। डोडा ईस्ट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक मलिक पर आरोप है कि उन्होंने केंचा में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को दूसरी जगह ले जाने का विरोध किया; कथित तौर पर मेडिकल डिवाइस और दवाएं चुराईं; सोशल मीडिया पर डिप्टी कमिश्नर को अपशब्द कहे; सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काया और भड़काऊ भाषणों के ज़रिए सार्वजनिक अशांति पैदा की।

हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने दावा किया था कि मलिक की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा थीं और उन्हें रोकने के लिए सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त नहीं था। आदेश में उन DDRs का भी हवाला दिया गया, जिनमें आरोप लगाया गया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने बुरहान वानी और मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों का महिमामंडन किया और जनता से "लश्कर" (लड़ाकू समूह) के तौर पर काम करने की अपील की थी।

इन निष्कर्षों को देखते हुए न्यायालय ने याचिका स्वीकार की, निरोध आदेश रद्द किया और निरुद्ध व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

Case Title: Mehraj Din Malik (through father Shamas Din) v. UT of J&K & Ors. (HCP No. 139/2025)

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