मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के बाद के चरण में भी CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का निर्देश दे सकते हैं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Update: 2026-04-07 14:16 GMT

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत के पास ऐसे मामले में आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति है, जहां की गई जांच में कोई कमी हो या कुछ पहलुओं की ठीक से जांच न की गई हो। ऐसा निर्देश संज्ञान लेने के बाद भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 173(8) का प्रयोग करते हुए जारी किया जा सकता है।

अदालत एक पूर्व नायब तहसीलदार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जम्मू के स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निरोधक) द्वारा पारित आदेशों को चुनौती दी गई। इन आदेशों में आगे की जांच का निर्देश देने वाला एक आदेश और उसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर करने की कथित साजिश के संबंध में जम्मू-कश्मीर पीसी एक्ट और RPC के तहत अपराधों के लिए उसके खिलाफ आरोप तय करने वाला एक अन्य आदेश शामिल है।

जस्टिस संजय धर की पीठ ने यह टिप्पणी की:

“ऐसे मामले में आगे की जांच का निर्देश देने के लिए मजिस्ट्रेट/स्पेशल कोर्ट की शक्ति के संबंध में कानूनी स्थिति यह है कि यदि अदालत इस बात से संतुष्ट है कि की गई जांच में कोई कमी है या मामले के कुछ पहलुओं की ठीक से जांच नहीं की गई है तो यह स्पष्ट है कि इस संबंध में निर्देश संज्ञान लेने के बाद के चरण में भी CrPC की धारा 156(3) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 173(8) में निहित प्रावधानों का सहारा लेकर दिया जा सकता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ जम्मू-कश्मीर पीसी एक्ट की धारा 5(1)(d), 5(2) और RPC की धारा 467, 468, 471 तथा 120-B के तहत अपराधों के लिए एक FIR दर्ज की गई। आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने जब वह जम्मू के सामान्य रिकॉर्ड कक्ष (General Record Room) में नायब तहसीलदार के पद पर तैनात था तो एक लाभार्थी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर करने के लिए एक पटवारी के साथ मिलकर साजिश रची थी।

आरोप पत्र (Chargesheet) जब ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो अदालत ने एक आदेश पारित करते हुए यह टिप्पणी की कि जांच एजेंसी ने इस बात का सत्यापन नहीं किया कि क्या याचिकाकर्ता वास्तव में व्यक्तिगत रूप से रिकॉर्ड का प्रभार संभाल रहा था, या फिर कोई अन्य अधीनस्थ अधिकारी उसका प्रभार देख रहा था। ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय करने पर विचार करने की प्रक्रिया को स्थगित कर दिया और जांच एजेंसी को इस चूक को सुधारने का निर्देश दिया।

इस आदेश के अनुसार, जाँच एजेंसी ने दो और गवाहों के बयान दर्ज किए और एक रिपोर्ट पेश की। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ने इन तीनों आदेशों को चुनौती दी।

अदालत की टिप्पणी:

अदालत ने सबसे पहले यह जांच की कि क्या ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता के प्रति कोई पक्षपात या पूर्व-निर्धारित धारणा दिखाई। 19 जनवरी, 2019 के आदेश को समग्र रूप से पढ़ने पर अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने केवल जांच में पाई गई कमियों की ओर इशारा किया और एक निष्पक्ष विश्लेषण किया। अदालत ने माना कि यह आदेश पक्षपातपूर्ण नहीं था और ट्रायल कोर्ट का उद्देश्य केवल याचिकाकर्ता की संलिप्तता से जुड़े पहलू की ठीक से जांच करवाना था।

अदालत ने टिप्पणी की,

“यदि यह याचिकाकर्ता के प्रति पक्षपात या पूर्व-निर्धारित धारणा का मामला होता तो माननीय ट्रायल कोर्ट जाँच एजेंसी को इस कमी की ओर इशारा करने के बजाय, केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने की दिशा में आगे बढ़ जाता कि वह उस समय रिकॉर्ड रूम का प्रभारी था।”

अदालत ने आगे कहा,

“जांच एजेंसी को उसकी इस ज़िम्मेदारी की याद दिलाते हुए कि वह रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री लाए जिससे किसी आपराधिक साज़िश के अस्तित्व का अनुमान लगाया जा सके, माननीय ट्रायल कोर्ट ने केवल उस पहलू की ओर इशारा करने की कोशिश की है, जहां जांच में कमी दिखाई दे रही थी।”

इसके बाद अदालत ने 19 जनवरी, 2019 के आदेश की प्रकृति पर विचार किया और यह माना कि यद्यपि ट्रायल कोर्ट ने “आगे की जांच” (Further Investigation) शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन वास्तव में यह निर्देश आगे की जांच के लिए ही था, जो केवल उस व्यक्ति (या व्यक्तियों) की पहचान सुनिश्चित करने तक सीमित था, जिसके पास छेड़छाड़ किए गए रिकॉर्ड की वास्तविक हिरासत थी।

राम लाल नारंग बनाम राज्य (दिल्ली प्रशासन) (1979) 2 SCC 322 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मामले का संज्ञान ले लिया गया, आगे की जांच को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि जब ट्रायल के दौरान जांच में कोई कमी सामने आती है तो अगर हालात इसकी मांग करते हैं तो आगे की जांच करके उस कमी को दूर किया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे विनुभाई हरिभाई मालवीय बनाम गुजरात राज्य (2019) 17 SCC 1 मामले का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने विपरीत विचारों को खारिज करते हुए यह माना कि CrPC की धारा 173(8) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 156(3) के तहत आगे की जांच का आदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति, आपराधिक कार्यवाही के सभी चरणों में तब तक बनी रहती है, जब तक कि ट्रायल शुरू नहीं हो जाता।

कोर्ट ने इस टिप्पणी का भी उल्लेख किया कि जांच का अंतिम उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन लोगों ने वास्तव में कोई अपराध किया, उन्हें सही तरीके से आरोपी बनाया जाए और जिन लोगों ने अपराध नहीं किया, उन्हें ट्रायल के लिए कटघरे में खड़ा न किया जाए; जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा अपेक्षित है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने यह माना कि ट्रायल कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहते हुए आरोप तय करने के चरण में भी आगे की जांच का निर्देश दे सकता है। इस प्रकार, 19 जनवरी, 2019 का आदेश बरकरार रखा गया।

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि जांच एजेंसी ने CrPC की धारा 173(2) के तहत अपेक्षित निर्धारित प्रारूप में पूरक आरोप पत्र (Supplementary Chargesheet) दाखिल न करके कानून के आदेश का उल्लंघन किया था; इस संदर्भ में कोर्ट ने डब्लू कुजुर बनाम झारखंड राज्य (2024) 6 SCC 758 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। फिर भी कोर्ट ने यह माना कि यह कमी सुधार योग्य है और एजेंसी को इसे ठीक करने का अवसर दिया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे यह भी पाया कि जांच एजेंसी ने FSL तकनीक का उपयोग करके छेड़छाड़ की अनुमानित अवधि का पता लगाए बिना, और याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत बचाव पक्ष के तर्कों का सत्यापन किए बिना, एक "अधूरी" (Half-Baked) जांच की थी। ट्रायल कोर्ट ने इस बात को संज्ञान में लेने के बावजूद कि संबंधित अवधि के दौरान पांच नायब तहसीलदार कार्यरत थे—जिनमें आरोपी पटवारी का एक दूर का चचेरा भाई भी शामिल था—आरोप तय करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

कोर्ट ने यह माना कि आरोप तय करने का वह आदेश विधि की दृष्टि से मान्य नहीं था। इस प्रकार, कोर्ट ने आगे की जांच का निर्देश देने वाले आदेश को सही ठहराते हुए, लेकिन याचिकाकर्ता के संबंध में आरोपों के मेमो वाला आदेश रद्द करते हुए याचिका का निपटारा किया। कोर्ट ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों के आधार पर आगे की जांच करे और CrPC की धारा 173(2) के तहत निर्धारित प्रारूप में अंतिम रिपोर्ट पेश करे।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला,

“याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने के सवाल पर ट्रायल कोर्ट द्वारा नए सिरे से विचार किया जाएगा। यह विचार उस पूरी सामग्री के आधार पर होगा, जिसे जांच एजेंसी उक्त कोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड पर ला सकती है।”

Case Title: Subash Chander Sharma v. SHO P/S Anti Corruption Bureau Jammu & Ors.

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