जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी आरोपी को दी गई जमानत कानून के विपरीत या अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करके दी गई है, तो बाद में आरोपी द्वारा जमानत का दुरुपयोग न किए जाने के बावजूद जमानत रद्द की जा सकती है।

जस्टिस एम.ए. चौधरी ने यह फैसला 24 किलोग्राम से अधिक गांजे की कथित बरामदगी के मामले में दिया। पुलवामा की विशेष एनडीपीएस अदालत ने आरोपी शबीर अहमद डार को जमानत दी थी, जिसे जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

NDPS कानून की धारा 37 महत्वपूर्ण

कोर्ट ने कहा कि गांजे की वाणिज्यिक मात्रा 20 किलोग्राम है। इसलिए 24 किलोग्राम से अधिक की कथित बरामदगी वाला मामला एनडीपीएस कानून की धारा 37 के अंतर्गत आता है।

इस धारा के तहत जमानत देने से पहले अदालत को संतुष्ट होना जरूरी है कि—

- आरोपी के दोषी न होने के उचित आधार मौजूद हैं।

- जमानत पर रहते हुए उसके कोई अन्य अपराध करने की संभावना नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि ये दोनों शर्तें अनिवार्य हैं और केवल औपचारिकता नहीं हैं।

जमानत रद्द करने को लेकर महत्वपूर्ण अंतर

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी के गलत आचरण और मूल जमानत आदेश की वैधता दो अलग-अलग बातें हैं।

अगर जमानत देने का मूल आदेश ही कानून के खिलाफ है या अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करके दिया गया है, तो उसे रद्द करने के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं कि आरोपी ने बाद में जमानत का दुरुपयोग किया।

इस मामले में कोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत ने धारा 37 की अनिवार्य शर्तों पर पर्याप्त विचार नहीं किया और सामान्य जमानत सिद्धांतों के आधार पर जमानत दे दी।

इसलिए हाईकोर्ट ने जमानत रद्द कर आरोपी को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का आरोपी के दोष या निर्दोषता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। आरोपी कानून के अनुसार नई जमानत याचिका दाखिल कर सकता है।

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