वयस्क बेटी को उसकी मर्जी के खिलाफ माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी वयस्क महिला को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने का मामला सामने नहीं आता, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से हैबियस कॉर्पस रिट जारी नहीं की जा सकती।
जस्टिस संजय धर ने स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति को केवल इस आधार पर किसी के साथ रहने या उसके साथ जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति उसका माता-पिता है।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक पिता की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपनी 20 वर्षीय बेटी को खोजने और उसे बरामद करने की मांग की थी। बेटी ने अपनी मर्जी से घर छोड़कर अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी की थी और वह अपने पति के साथ रह रही थी।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता बशीर अहमद ने अदालत को बताया कि उनकी बेटी 11 जुलाई, 2026 को हायर सेकेंडरी स्कूल पार्ट-I की वार्षिक परीक्षा देने के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। उन्होंने आरोप लगाया कि परिवार के प्रयासों के बावजूद उसका पता नहीं चल सका।
पिता के अनुसार, उन्होंने 12 जुलाई, 2026 को संबंधित पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन बेटी का पता लगाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। उन्हें आशंका थी कि उनकी बेटी का अपहरण किया गया है या उसे गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है।
उन्होंने अदालत से बेटी को बरामद करने और मामले की जांच के लिए विशेष टीम गठित करने का निर्देश देने की मांग की।
बेटी ने कोर्ट में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान बेटी ने स्वयं मामले में पक्षकार बनाए जाने का अनुरोध किया और अपना जवाब दाखिल किया। उसने कहा कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से घर छोड़कर अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने गई थी। उसके निर्णय पर किसी तरह का दबाव या अनुचित प्रभाव नहीं था।
जस्टिस संजय धर ने उसे अदालत में पेश होने का निर्देश दिया और उससे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। इस दौरान महिला ने बताया कि वह अपने पति मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ किश्तवाड़ में रह रही है और उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से शादी की है।
उसने स्पष्ट किया कि वह अपने पति के साथ ही रहना चाहती है और उसे पिता की अभिरक्षा में नहीं सौंपा जाना चाहिए। अदालत के रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल ने उसका बयान शपथ पर दर्ज किया।
महिला ने यह भी बताया कि उसने और उसके पति ने पहले भी कथित उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था, जिस पर अदालत ने उनके पक्ष में निर्देश जारी किए थे।
हैबियस कॉर्पस रिट पर कोर्ट की टिप्पणी
कानूनी स्थिति पर विचार करते हुए जस्टिस धर ने कहा कि जब कोई वयस्क महिला स्वेच्छा से और स्पष्ट रूप से अपने पति के साथ रहने का फैसला करती है, तो उसके निर्णय को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि हैबियस कॉर्पस रिट का उद्देश्य किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराना है। इसका इस्तेमाल किसी वयस्क को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर करने हेतु नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, “किसी बालिग व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति के साथ रहने या उसके साथ जाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही वह व्यक्ति उसका माता-पिता ही क्यों न हो।”
गैरकानूनी हिरासत का मामला नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और महिला के बयान पर विचार करते हुए पाया कि ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह साबित हो कि उसे गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है। इसके विपरीत, उपलब्ध सामग्री से संकेत मिलता है कि उसने स्वेच्छा से अपना घर छोड़ा और अपने पति के साथ रहने का निर्णय लिया।
अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में हैबियस कॉर्पस रिट जारी करने का आवश्यक आधार मौजूद नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “इसलिए, यह गैरकानूनी हिरासत का मामला नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में हैबियस कॉर्पस रिट जारी नहीं की जा सकती।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि बालिग बेटी अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र है।