72 घंटे बाद मेडिकल जांच में स्पर्मेटोजोआ न मिलना रेप पीड़िता की गवाही को गलत साबित नहीं करता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि घटना के 72 घंटे बाद की गई मेडिकल जांच में स्पर्मेटोजोआ (Spermatozoa) नहीं मिलने से रेप पीड़िता की गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती। इतने समय के अंतराल के बाद स्पर्मेटोजोआ का नहीं मिलना स्वाभाविक है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता का हाइमन (Hymen) सुरक्षित होना या उसके निजी अंगों पर चोट के निशान नहीं मिलना भी यौन उत्पीड़न की घटना को नकारने का आधार नहीं हो सकता, यदि उसकी गवाही विश्वसनीय है और झूठे आरोप में फंसाने का कोई आधार सामने नहीं आता।
जस्टिस राजनेश ओसवाल ने नाबालिग से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
क्या था मामला?
यह मामला वर्ष 2014 का है। पीड़िता के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि 16 नवंबर 2014 को उनकी 11 वर्षीय बेटी बकरियों के लिए पत्तियां इकट्ठा करने खेतों में गई थी, लेकिन वापस नहीं लौटी।
तलाश करने पर वह झाड़ियों में बेहोशी की हालत में मिली। उसके कपड़ों पर खून के निशान थे। पीड़िता ने बताया कि तीन आरोपी उसे झाड़ियों में ले गए, जहां उनमें से दो ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
इस मामले में FIR दर्ज कर जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया। ट्रायल कोर्ट ने राकेश सिंह और संजीव शर्मा को अपहरण और दुष्कर्म के अपराध में दोषी ठहराया, जबकि राशपाल शर्मा को अपहरण और उकसाने के अपराध में दोषी ठहराया था।
इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
आरोपियों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल जांच में स्पर्मेटोजोआ नहीं मिला और पीड़िता का हाइमन भी सुरक्षित था। इसलिए मेडिकल साक्ष्य अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं करते।
उन्होंने FIR दर्ज करने में चार दिन की देरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और पीड़िता के कपड़ों की जब्ती की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
मेडिकल साक्ष्य पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटना 16 नवंबर 2014 को हुई थी, जबकि पीड़िता की मेडिकल जांच 19 नवंबर 2014 को की गई। ऐसे में 72 घंटे बाद स्पर्मेटोजोआ नहीं मिलना स्वाभाविक है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Wahid Khan v. State of M.P. (2010) का हवाला देते हुए कहा कि दुष्कर्म का अपराध साबित करने के लिए पूर्ण प्रवेश या वीर्य का स्खलन होना आवश्यक नहीं है।
हाइमन सुरक्षित होने और चोट के निशान नहीं मिलने पर कोर्ट ने कहा कि इससे पीड़िता की गवाही झूठी साबित नहीं होती, खासकर जब जिरह के दौरान उसकी विश्वसनीयता पर संदेह करने या उसे झूठा फंसाने का कोई कारण सामने नहीं आया।
FIR में देरी और अन्य साक्ष्यों पर भी विचार
FIR दर्ज करने में चार दिन की देरी पर कोर्ट ने State of Punjab v. Gurmit Singh (1996) के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को बेहोशी की हालत में झाड़ियों से बरामद कर अस्पताल ले जाया गया था। यह परिस्थितियां पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को स्पष्ट करती हैं।
कपड़ों की जब्ती पर कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी की गवाही और जब्ती मेमो को साबित करने वाले साक्ष्य पर भरोसा किया जा सकता है। कोर्ट ने Mallikarjun v. State of Karnataka (2019) का भी हवाला दिया।
इसके अलावा, FSL रिपोर्ट में पीड़िता की पैंट पर स्पर्मेटोजोआ और खून के निशान पाए गए थे, जिन्हें बचाव पक्ष संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सका।
दो आरोपियों की सजा बरकरार, तीसरे को राहत
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राकेश सिंह और संजीव शर्मा की अपीलें खारिज कर उनकी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी।
हालांकि, तीसरे आरोपी राशपाल शर्मा की अपील स्वीकार कर ली गई। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक या अपराध में संलिप्तता दर्शाने वाला बयान नहीं दिया था। इसलिए उसकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी गई।