ऐतिहासिक किताबों से संपत्ति का हक साबित नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट

Update: 2026-04-06 11:59 GMT

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि ऐतिहासिक किताबों या दस्तावेजों के आधार पर किसी संपत्ति का मालिकाना हक (title) साबित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय धर की पीठ ने कहा कि Indian Evidence Act, 1872 की धारा 57 के तहत कोर्ट केवल “सार्वजनिक इतिहास” (public history) के मामलों में संदर्भ पुस्तकों का सहारा ले सकती है, न कि निजी या स्थानीय विवादों में।

क्या था मामला?

मामला किश्तवाड़ स्थित दो दरगाहों—जियारत फरीद-उद-दीन साहिब और जियारत अस्रार-उद-दीन साहिब—की संपत्तियों से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे इन संपत्तियों के पारंपरिक वारिस (सज्जादा नशीन) हैं और ये उनकी निजी संपत्ति है।

उन्होंने अपने दावे के समर्थन में ऐतिहासिक दस्तावेज और किताबें जैसे अहदनामा, पटनामा और “तारीख-ए-किश्तवाड़” का हवाला दिया।

वहीं, प्रतिवादियों ने कहा कि ये संपत्तियां वक्फ (Wakaf) की हैं, जैसा कि राजस्व रिकॉर्ड में भी दर्शाया गया है।

कोर्ट का अवलोकन

कोर्ट ने कहा कि:

संपत्ति के मालिकाना हक का सवाल “सार्वजनिक इतिहास” का विषय नहीं है

इसलिए ऐतिहासिक किताबों का उपयोग मालिकाना हक साबित करने के लिए नहीं किया जा सकता

भले ही किताबें प्रसिद्ध इतिहासकारों द्वारा लिखी गई हों, फिर भी वे कानूनी प्रमाण नहीं बन सकतीं

कोर्ट ने यह भी कहा कि राजस्व रिकॉर्ड (जमाबंदी) में मालिक के रूप में जियारत दर्ज है, जो एक मजबूत साक्ष्य है, और याचिकाकर्ता इसे खारिज करने के लिए ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सके।

फैसला

कोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए माना कि संबंधित संपत्तियां वक्फ संपत्ति हैं।

हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए उन्हें उस जमीन पर बने उनके आवासीय मकानों में वक्फ संपत्ति के लीजधारक (lessee) के रूप में रहने की अनुमति दी।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि ऐतिहासिक संदर्भों का उपयोग केवल सामान्य इतिहास समझने के लिए किया जा सकता है, न कि निजी संपत्ति के कानूनी अधिकार साबित करने के लिए।

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