गरीबी कोई अपराध नहीं, जिसके पास भुगतान करने का कोई स्रोत नहीं, उसके खिलाफ धन डिक्री का हवाला देते हुए उसे जेल नहीं भेजा जा सकता: मध्यप्रदेश हाइकोर्ट

Update: 2024-02-14 07:19 GMT

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने दोहराया कि किसी देनदार के खिलाफ केवल धन डिक्री के आधार पर उसे सिविल जेल में नहीं भेजा जा सकता, यदि उसके पास कोई वेतन का स्रोत नहीं है।

जस्टिस द्वारका धीश बंसल की एकल न्यायाधीश पीठ ने यह भी कहा कि गरीबी के कारण डिक्रीटल राशि का भुगतान करने में असमर्थता कोई अपराध नहीं है।

जबलपुर में बैठी पीठ ने कहा,

“माननीय सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय के मद्देनजर यह स्पष्ट है कि केवल इसलिए कि प्रतिवादी के पक्ष में धन डिक्री है। याचिकाकर्ता के पास डिक्रीटल राशि का भुगतान करने के लिए कोई संपत्ति या स्रोत नहीं होने पर उसे सिविल जेल नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि गरीबी कोई अपराध नहीं है।”

अदालत ने अपनी टिप्पणियों के समर्थन में जॉली जॉर्ज वर्गीस और अन्य बनाम बैंक ऑफ कोचीन (1980) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अंश दोहराया।

जॉली वर्गीस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

''दरिद्र नारायण की इस भूमि (गरीबी की भूमि) में गरीब होना कोई अपराध नहीं है और किसी को जेल में डालने की प्रक्रिया द्वारा कर्ज वसूल करना कला का बहुत बड़ा उल्लंघन है, जब तक कि उसके पर्याप्त साधनों के बावजूद भुगतान करने में उसकी जानबूझकर विफलता की न्यूनतम निष्पक्षता का सबूत न हो।”

एकल न्यायाधीश पीठ ने यह भी बताया कि निष्पादन न्यायालय सीपीसी की धारा 51 और आदेश 21 नियम 37 और 40 में निहित प्रावधानों का पालन करने में विफल रहा है। अदालत ने कहा कि जब निष्पादन अदालत फैसले के देनदार को सिविल जेल में हिरासत के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करती है, तो आदेश 21 के नियम 40 (1) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

उक्त नियम यह निर्धारित करता है कि आदेश 21 नियम 37 नोटिस जारी करने के बाद निष्पादन न्यायालय से डिक्री धारक और उसके निष्पादन आवेदन के समर्थन में प्रस्तुत सभी सबूतों को सुनने की उम्मीद की जाती है। इसके बाद कार्यकारी अदालत को जजमेंट देनदार को सुनवाई का अवसर देने की आवश्यकता होती है, जिससे वह अदालत को यह समझाने की अनुमति दे सके कि उसे सिविल जेल में क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए।

हालांकि मौजूदा मामले में कार्यकारी अदालत ने आदेश 21 के नियम 40 के खंड (1) में विचार के अनुसार उचित जांच नहीं करके उपरोक्त नियमों का घोर उल्लंघन किया।

जस्टिस बंसल ने कहा कि सीपीसी की धारा 51 के प्रावधान की शर्तें या देनदार को सिविल जेल भेजने के लिए बनाए गए कारणों को दर्ज करना अदालत ने अनुपालन की आवश्यकता को भी नजरअंदाज किया।

उपरोक्त कारणों पर ध्यान देने के बाद जबलपुर की पीठ ने निचली अदालत के फैसले के देनदार को सिविल जेल भेजने का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कार्यकारी अदालत को आदेश 21 नियम 37 सीपीसी के कड़ाई से अनुपालन में डिक्री धारक के आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लेने का भी निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

इस विविध याचिका में याचिकाकर्ता कर्जदार तृतीय सिविल न्यायाधीश वर्ग-1 टीकमगढ़ द्वारा पारित आदेश को चुनौती दे रहा था। इस आदेश में कार्यकारी अदालत ने एक साथ जेडी को कारण बताओ नोटिस जारी किया और डिक्री धारक से उस अवधि को निर्दिष्ट करने के लिए कहा, जिसके लिए वह जेडी को सिविल जेल भेजना चाहता है।

याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया कि प्रतिवादी ने स्वयं निष्पादन आवेदन में स्वीकार किया कि पूर्व में अपनी कोई संपत्ति नहीं है। आवेदन के अनुसार पूरी संपत्ति पहले ही जजमेंट देनदार की पत्नी और बच्चों को ट्रांसफर कर दी। कार्यकारी अदालत के समक्ष जजमेंट देनदार द्वारा दायर जवाब में उसने इस बात से इनकार किया कि उसने अपनी पत्नी और बेटों को कोई संपत्ति ट्रांसफर की है।

जेडी ने यह भी तर्क दिया कि उन्होंने पहले ही अपना व्यवसाय बंद कर दिया और केवल अपनी नौकरी से वेतन का उपयोग करके किश्तों में डिक्रीटल राशि का भुगतान कर सकते हैं। इन परिस्थितियों में निष्पादन अदालत ने जेडी को जल्दबाजी में जेल भेजकर गलती की, जबकि उसने आक्षेपित आदेश के अनुसार कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया।

आगे के अवलोकन

निचली अदालत के रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद हाइकोर्ट ने पाया कि निष्पादन अदालत ने जांच के माध्यम से यह निर्धारित करने की जहमत नहीं उठाई कि क्या याचिकाकर्ता के पास कोई संपत्ति है, या उसने मुकदमा लंबित रहने के दौरान अपनी पत्नी और बेटों के नाम पर संपत्ति ट्रांसफर की। अदालत ने रेखांकित किया कि ऐसी जांच के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता ने पर्याप्त साधन होने के बावजूद डिक्रीटल राशि का भुगतान करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने विसंगति के बारे में आगे कहा,

दूसरी ओर, उसी पैराग्राफ के पहले भाग में (कार्यकारी अदालत) ने इस आशय का निष्कर्ष दर्ज किया कि याचिकाकर्ता डिक्री राशि की वसूली के लिए उसके पास कोई संपत्ति नहीं है। वह सिविल जेल भेजे जाने का पात्र है। आक्षेपित आदेश से यह भी स्पष्ट नहीं है कि याचिकाकर्ता को सिविल जेल में भेजने का आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ता ने कभी भी धन की वसूली के लिए उसके खिलाफ पारित डिक्री के तहत अपने दायित्व से बचने की कोशिश की।”

याचिकाकर्ता की ओर से वकील- श्रीकांत श्रीवास्तव उपस्थित हुए।

प्रतिवादी की ओर से वकील- डी.सी मलिक ने किया।

केस टाइटल- सदकिक अकरम बनाम कुलदीप

केस नंबर- विविध. 2023 की याचिका संख्या 7452

साइटेशन- लाइव लॉ (एमपी) 31 2024

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