गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की कार्यवाही तब रद्द नहीं की जा सकती, जब पार्टियों के बीच कथित वैवाहिक रिश्ते की प्रकृति का पता लगाने के लिए ट्रायल में सबूत की ज़रूरत हो।

जस्टिस संजीव कुमार शर्मा ने कहा,

"हालांकि शादी की तारीखों और जगहों के बारे में अलग-अलग कार्यवाहियों में प्रतिवादी (रेस्पॉन्डेंट) के विरोधाभासी बयानों से शादी के तथ्य पर कुछ संदेह पैदा होता है, लेकिन यह स्थापित कानून है कि BNSS की धारा 144 के तहत कार्यवाही में पति-पत्नी जैसे रिश्ते को साबित करना ही काफी है और इसे केवल ट्रायल के दौरान सबूत पेश करके ही साबित किया जा सकता है।"

यह टिप्पणी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के साथ धारा 438 और 442 के तहत दायर एक आपराधिक याचिका में की गई। इस याचिका में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के सामने लंबित मामला रद्द करने की मांग की गई, जिसमें प्रतिवादी ने BNSS की धारा 144 के तहत गुज़ारा-भत्ते का दावा किया था।

याचिकाकर्ता ने बताया कि वह सितंबर 2014 और अगस्त 2016 के बीच गुवाहाटी में पढ़ाई के दौरान कॉमन दोस्तों के ज़रिए प्रतिवादी को जानता था। उसके अनुसार, प्रतिवादी ने शादी का प्रस्ताव रखा, जिसे उसने ठुकरा दिया, जिसके बाद उसने उसके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए।

ऐसे ही एक मामले में वह बरी हो गया, जबकि दूसरा मामला अभियोजन पक्ष द्वारा केस वापस लेने के बाद खत्म हो गया। प्रतिवादी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत भी कार्यवाही शुरू की।

याचिकाकर्ता ने इस बात का खंडन किया कि प्रतिवादी उसकी कानूनी रूप से ब्याही पत्नी थी या वे कभी पति-पत्नी के तौर पर साथ रहे थे। उसने शादी के बारे में उसके बयानों में कथित विरोधाभासों का हवाला दिया।

एक अन्य कार्यवाही में दायर हलफनामे में प्रतिवादी ने कहा कि शादी 27 जनवरी, 2015 को कृष्णा मंदिर, नरेंगी, गुवाहाटी में हुई, जबकि गुज़ारा-भत्ता की कार्यवाही में उसने कहा कि शादी 15 जनवरी, 2015 को धेमाजी में हुई।

याचिकाकर्ता ने उसकी प्रेगनेंसी के बारे में उसके बयानों में कथित विरोधाभासों का भी ज़िक्र किया और तर्क दिया कि यह कार्यवाही गलत मकसद से शुरू की गई।

इन विसंगतियों के आधार पर यह तर्क दिया गया कि गुज़ारा-भत्ता की कार्यवाही रद्द किए जाने योग्य है। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि इस बात के सबूत कि क्या वह याचिकाकर्ता से विवाहित थी, या क्या वे पति-पत्नी के रिश्ते में थे - जिससे उसे BNSS की धारा 144 के तहत गुजारा-भत्ता पाने का अधिकार मिलता - केवल मुकदमे (ट्रायल) के दौरान ही पेश किए जा सकते हैं।

यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को ऐसे सबूतों का खंडन करने का मौका मिलेगा और तथ्य के विवादित सवालों पर, जिनके लिए सबूत की आवश्यकता होती है, हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करके फैसला नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट को प्रतिवादी की दलीलों में "पर्याप्त दम" लगा।

कोर्ट ने माना कि हालांकि शादी की तारीखों और जगहों के बारे में विरोधाभासी बयानों से शादी के तथ्य पर कुछ संदेह पैदा हुआ, लेकिन पार्टियों के बीच रिश्ते की प्रकृति केवल मुकदमे के दौरान सबूत पेश करके ही स्थापित की जा सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा,

"इसलिए इस मामले में भले ही प्रतिवादी द्वारा बताई गई शादी की तारीखों और जगहों के संबंध में कोई विसंगति हो, उस पर मुकदमे के दौरान विचार किया जाना है और वास्तविक शादी के तथ्य के अलावा, रिश्ते की प्रकृति के सवाल की भी जांच की जानी चाहिए कि क्या यह पति-पत्नी का रिश्ता था, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या प्रतिवादी गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है।"

तदनुसार, कोर्ट ने गुजारा-भत्ता की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

कोर्ट ने कहा,

"उपर्युक्त कारणों से यह कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए विवादित कार्यवाही रद्द करने से इनकार करता है। तदनुसार, आपराधिक याचिका खारिज की जाती है।"

Case Title: Shri Suraj Chetry v. Smti. Nayanmoni Choudhury

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