गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक-ए-हसन भारत में फिलहाल वैध तलाक का एक रूप है और प्रतिबंधित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि असम में इस तरह के तलाक का रजिस्ट्रेशन 2024 के असम अनिवार्य मुस्लिम विवाह एवं तलाक पंजीकरण अधिनियम के तहत संबंधित विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के समक्ष कराया जा सकता है।

जस्टिस अरुण देव चौधरी ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक पति ने बारपेटा के उप-पंजीयक-सह-विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार द्वारा तलाक-ए-हसन के पंजीकरण से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी।

पति का कहना था कि उसकी पत्नी 2018 में उसे छोड़कर चली गई और उसके प्रयासों के बावजूद वैवाहिक घर वापस नहीं लौटी। पत्नी की ओर से कथित क्रूरता और विवाह के पूरी तरह टूट जाने का हवाला देते हुए उसने 22 मार्च 2026, 26 अप्रैल 2026 और 27 मई 2026 को गवाहों की मौजूदगी में क्रमशः तीन बार तलाक का उच्चारण किया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में दिए 2017 के फैसले का हवाला देते हुए तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया को समझाया। कोर्ट ने कहा कि इसमें तलाक के तीन क्रमिक उच्चारण होते हैं। पहले उच्चारण के बाद एक महीने के भीतर पति-पत्नी के बीच सहवास फिर शुरू हो जाए तो तलाक रद्द माना जाता है।

यदि ऐसा नहीं होता है तो पहले उच्चारण के एक महीने बाद पत्नी के मासिक धर्म से मुक्त अवधि में दूसरा तलाक कहा जाता है। दूसरे उच्चारण के बाद भी यदि एक महीने के भीतर सहवास शुरू नहीं होता और तलाक वापस नहीं लिया जाता तो तीसरे 'तुअहर' यानी पवित्र अवधि में तीसरा तलाक कहा जाता है। तीसरा उच्चारण होते ही तलाक अपरिवर्तनीय हो जाता है और विवाह समाप्त माना जाता है। इसके बाद पत्नी को निर्धारित इद्दत की अवधि पूरी करनी होती है।

मामले में पति ने कहा कि उसने तीनों तलाकनामे गवाहों की मौजूदगी में तैयार कर पत्नी को भेजे थे। दूसरे तलाक के बाद कोई सुलह नहीं होने पर उसने 27 मई को तीसरा तलाक दिया और इसके बाद 2 जून 2026 को 2024 के कानून की धारा 12 के तहत तलाक के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया। हालांकि, रजिस्ट्रार ने इसे पंजीकृत करने से इनकार किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि 2024 के कानून की धारा 12 के तहत तलाक होने के एक महीने के भीतर पक्षकारों को संबंधित विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के समक्ष उसके पंजीकरण के लिए आवेदन करना होता है। रजिस्ट्रार को यह संतुष्ट करना होता है कि तलाक उसी व्यक्ति ने दिया, जिसके द्वारा तलाक दिए जाने का दावा किया गया है और उसके सामने पेश व्यक्ति की पहचान भी सुनिश्चित करनी होती है।

यदि रजिस्ट्रार संतुष्ट होता है तो तलाक की प्रविष्टि रजिस्टर में की जाएगी। पंजीकरण के समय तलाक के लिए आवेदन करने वाले पक्षकारों की मौजूदगी और उनके हस्ताक्षर भी आवश्यक हैं।

कोर्ट ने हालांकि पति के पक्ष में सीधे तलाक दर्ज करने का आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि 1935 का पुराना कानून निरस्त हो चुका है और उसके तहत बनाए गए सदर काजी तथा मुस्लिम विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के पद भी समाप्त हो चुके हैं। इसलिए पुराने कानून के तहत नियुक्त रजिस्ट्रार को तलाकनामा दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

लेकिन कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि पति की ओर से दिया गया तलाक-ए-हसन वैध तलाक का रूप है और फिलहाल देश में प्रतिबंधित नहीं है। इसलिए उसे 2024 के असम कानून के तहत संबंधित विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण के लिए जाने की स्वतंत्रता दी गई।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि आवेदन मिलने पर संबंधित रजिस्ट्रार यह जांच करेगा कि तलाक वास्तव में याचिकाकर्ता ने ही दिया और उसकी पहचान सुनिश्चित करने के बाद 2024 के कानून की धारा 12 और उसके प्रावधानों के तहत पंजीकरण की जरूरत पर फैसला करेगा। शर्तें पूरी होने पर तलाक की प्रविष्टि तलाक रजिस्टर में की जाएगी।

यदि रजिस्ट्रार रजिस्ट्रेशन से इनकार करता है तो पति को 2024 के कानून की धारा 17 के तहत उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता होगी।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी को नोटिस की तामील के बावजूद वह अदालत के समक्ष पेश नहीं हुई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी कानून के अनुसार उचित मंच के समक्ष तलाक-ए-हसन को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र है।

इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया।

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