अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट निर्णय की प्रक्रिया देखता है, गुण-दोष नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की उचित मूल्य दुकान का लाइसेंस रद्द किए जाने के मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र में अदालत केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करती है, न कि निर्णय के गुण-दोष का मूल्यांकन।
जस्टिस संजय कुमार मेधी ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत सर्टियोरारी अधिकार का प्रयोग केवल यह देखने तक सीमित है कि क्या निर्णय लेते समय प्रासंगिक तथ्यों पर विचार किया गया या नहीं, अथवा क्या निर्णय किसी अप्रासंगिक या बाहरी कारणों पर आधारित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र या दुर्भावना (मलाफाइड) का इस मामले में कोई आरोप नहीं है।
यह टिप्पणी हाइकोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें वर्ष 2022 में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के उप निदेशक (प्रभारी) द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत याचिकाकर्ताओं का पीडीएस लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं को विधि के अनुसार उचित मूल्य दुकान का लाइसेंस प्रदान किया गया और वे उसका संचालन कर रहे थे। बाद में उनके खिलाफ कुछ आरोप लगाए गए, जिसके आधार पर जांच की गई और पहले लाइसेंस निलंबित किया गया। इसके बाद कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आगे चलकर अतिरिक्त उप निदेशक (प्रभारी) द्वारा एक और कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका याचिकाकर्ताओं ने जवाब दिया। पूरी प्रक्रिया के बाद लाइसेंस रद्द करने का अंतिम आदेश पारित किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जांच के दौरान उन्हें समुचित अवसर नहीं दिया गया। यह भी कहा गया कि अतिरिक्त उपायुक्त (प्रभारी) की भूमिका अनुचित थी, क्योंकि असम सार्वजनिक वितरण लेख आदेश, 1982 के तहत उपायुक्त अपीलीय प्राधिकारी है। साथ ही आरोपों को तथ्यहीन बताते हुए कहा गया कि उन्हें अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं मिला।
वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया। यह भी दलील दी गई कि चूंकि आदेश उप निदेशक द्वारा पारित किया गया, इसलिए याचिकाकर्ताओं को उपायुक्त के समक्ष अपील करने में कोई पूर्वाग्रह नहीं होगा। अतिरिक्त कारण बताओ नोटिस केवल तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए जारी किया गया था और याचिकाकर्ताओं को पूरा अवसर दिया गया।
रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पूरा अवसर दिया गया और उन्होंने 8 नवंबर 2018 को अपना जवाब दाखिल किया, जिस पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने विचार किया। 2 सितंबर, 2022 के आदेश से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ताओं के बचाव पक्ष पर समुचित विचार किया गया और सभी प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखा गया।
हाइकोर्ट ने सर्टियोरारी अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को दोहराते हुए केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद बनाम बिकर्तन दास मामले पर भरोसा किया और कहा कि इस प्रकरण में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
इसके साथ ही हाइकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।