लंबे अंतराल के कारण अनुकंपा नियुक्ति से इनकार, लेकिन मनमाने निर्णय पर मुआवज़ा मंजूर: गौहाटी हाइकोर्ट

Update: 2026-01-31 11:08 GMT

गौहाटी हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद अत्यधिक समय बीत चुका हो तो अनुकंपा नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसका उद्देश्य तत्काल राहत प्रदान करना होता है।

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता के मामले में राज्य स्तरीय समिति द्वारा किया गया निर्णय मनमाना और भेदभावपूर्ण था, जिसके लिए मुआवज़ा दिया जाना उचित है।

जस्टिस एन. उन्नी कृष्णन नायर ने कहा कि याचिकाकर्ता के पिता, जो सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में जुगाली के पद पर कार्यरत थे, का 14 मई 2012 को सेवा के दौरान निधन हो गया था। याचिकाकर्ता ने उसी वर्ष अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन अब लगभग 13 वर्ष बीत चुके हैं।

अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के तुरंत बाद परिवार को राहत देना होता है और इतने लंबे समय बाद इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। इसलिए याचिकाकर्ता का दावा अब पुराना और अप्रासंगिक हो चुका है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता का मामला वर्ष 2014 में जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुशंसित किया गया और बाद में इसे वर्ष 2019 में राज्य स्तरीय समिति के समक्ष रखा गया। उसी बैठक में याचिकाकर्ता का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि आवेदन की वैधता समाप्त हो चुकी है और रिक्तियां उपलब्ध नहीं थीं, जबकि उसी बैठक में एक अन्य आवेदक, प्रतिवादी संख्या 7, का मामला यह कहते हुए स्वीकार कर लिया गया कि रिक्तियां उपलब्ध हैं और आवेदन की वैधता समाप्त नहीं हुई।

हाइकोर्ट ने इस विरोधाभासी दृष्टिकोण पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता के आवेदन को लंबित रहने और रिक्तियों के अभाव के आधार पर खारिज किया गया तो वही तर्क प्रतिवादी संख्या 7 के मामले में भी समान रूप से लागू होना चाहिए था। इस प्रकार, याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव किया गया।

हालांकि, अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि प्रतिवादी संख्या 7 को 18 नवंबर 2021 को अनुकंपा नियुक्ति दी जा चुकी है और वह लगभग चार वर्षों की सेवा पूरी कर चुका है। ऐसे में हाइकोर्ट ने उस नियुक्ति में हस्तक्षेप करने से स्वयं को विरत रखा।

इसके बावजूद, हाइकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार उचित और निष्पक्ष तरीके से नहीं किया गया। इसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये की राशि मुआवज़े के रूप में अदा करे ताकि उसके साथ हुई वंचना की आंशिक भरपाई की जा सके।

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