चेक बाउंस मामले में यदि आरोपी की दलील प्रथम दृष्टया विश्वसनीय हो तो अंतरिम मुआवजा नहीं दिया जा सकता: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि चेक बाउंस मामले में ऐसे विवादित तथ्य हों जिनका निपटारा साक्ष्यों के माध्यम से किया जाना आवश्यक हो, तो उस अवस्था में परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 143-ए के तहत अंतरिम मुआवजा देना उचित नहीं होगा।
जस्टिस प्रांजल दास ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी को चेक राशि का 20 प्रतिशत अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
हाइकोर्ट ने कहा कि अंतरिम मुआवजा देने से पहले कोर्ट का यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि शिकायतकर्ता के पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस प्रकार की प्रथम दृष्टया संतुष्टि के लिए कोर्ट को शिकायतकर्ता के मामले के साथ-साथ आरोपी द्वारा प्रस्तुत बचाव पक्ष की दलीलों के गुण-दोष पर भी विचार करना होता है।
यदि आरोपी का बचाव प्रथम दृष्टया विश्वसनीय प्रतीत होता है तो कोर्ट अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए अंतरिम मुआवजा देने से इनकार कर सकता है।
यह मामला NI Act की धारा 138 के तहत दायर एक चेक बाउंस शिकायत से जुड़ा था, जिसमें 20 लाख रुपये के चेक के अनादर का आरोप था। चेक को “ड्रॉअर के हस्ताक्षर मेल नहीं खाते” के आधार पर अस्वीकृत किया गया।
आरोपी ने चेक जारी करने और उस पर किए गए हस्ताक्षर से इनकार किया। उसने यह भी दावा किया कि वह संबंधित बैंक खाते का धारक नहीं है। आरोपी ने यह भी बताया कि उसके हस्ताक्षर की जालसाजी के आरोप में उसने पहले ही शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 468 और 471 के तहत मामला पंजीकृत किया गया।
हाइकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि आरोपी की दलीलों को बैंक शाखा प्रबंधक की गवाही से समर्थन मिला है।
मामले के समग्र तथ्यों पर विचार करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से विवादित प्रश्नों का मामला है, जिनका समाधान केवल साक्ष्यों के समुचित परीक्षण के बाद ही संभव है। तभी यह तय किया जा सकता है कि आरोपी पर NI Act की धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व बनता है या नहीं।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद, इस स्तर पर धारा 143-ए के तहत अंतरिम मुआवजा देना विवेकपूर्ण नहीं होगा।
इस आधार पर गुवाहाटी हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम मुआवजे का आदेश रद्द कर दिया।