महज हाथ छूना आपराधिक बल नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट ने IIT प्रोफेसर पर दर्ज यौन उत्पीड़न का मामला किया रद्द

Update: 2026-02-12 07:17 GMT

गुवाहाटी हाइकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि केवल किसी महिला का हाथ छू लेना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत आपराधिक बल या महिला की लज्जा भंग करने का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने इसी आधार पर एक IIT प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न का आपराधिक मामला रद्द किया।

जस्टिस संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि IPC की धारा 354 के तहत अपराध तभी बनता है जब आपराधिक बल का प्रयोग हुआ हो और महज हाथ छूना कानून में परिभाषित बल की श्रेणी में नहीं आता।

यह मामला उस शिकायत से जुड़ा था, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया कि वह अपने स्टार्टअप आइडिया के लिए मार्गदर्शन लेने प्रोफेसर के पास गई और इस दौरान प्रोफेसर ने उसका हाथ छुआ।

IPC की धारा 349 में बल की परिभाषा की व्याख्या करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा,

“इस प्रावधान को ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि किसी कृत्य को बल कहने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के पूरे शरीर की गति में परिवर्तन या गति का रुकना उत्पन्न किया गया हो। केवल शरीर के किसी एक हिस्से को छूना बल की परिभाषा में नहीं आता।”

उन्होंने आगे कहा,

“जब तक किसी व्यक्ति को जबरन चलने दिशा बदलने या रुकने के लिए मजबूर न किया जाए तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उसके खिलाफ बल का प्रयोग किया गया है। केवल स्पर्श करना धारा 349 के तहत बल नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब बल की परिभाषा ही पूरी नहीं होती तो IPC की धारा 350 के तहत आपराधिक बल का सवाल ही पैदा नहीं होता।

IPC की धारा 351 जो हमले (असॉल्ट) को परिभाषित करती है उस पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा,

“हमले की परिभाषा में ऐसे इशारे या तैयारी की बात कही गई, जिसमें वास्तविक शारीरिक संपर्क न हुआ हो। जैसे ही वास्तविक संपर्क हो जाता है वह कृत्य धारा 351 के दायरे से बाहर चला जाता है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रोफेसर के खिलाफ विभागीय जांच हुई, जिसमें शिकायतकर्ता की भागीदारी भी थी। जांच के बाद आरोप निराधार पाए गए। कोर्ट के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि विभागीय जांच में प्रतिकूल परिणाम आने के बाद शिकायतकर्ता ने बदले की भावना से एफआईआर दर्ज कराई।

जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश या प्रतिशोध के लिए नहीं किया जा सकता।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने IIT प्रोफेसर के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

निष्कर्षत: यह फैसला आपराधिक कानून में आपराधिक बल और महिला की लज्जा भंग की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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