बालीग होने के बाद शादी करने से नाबालिग के साथ सेक्स को कानूनी नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि महिला और आरोपी के बीच बालिग होने के बाद हुई शादी, उस सेक्सुअल इंटरकोर्स (यौन संबंध) को कानूनी नहीं बना सकती जो कथित तौर पर तब हुआ था, जब वह नाबालिग थी। कोर्ट ने कहा कि एक लंबे समय तक चलने वाला रिश्ता बाद में कानूनी सहमति नहीं दे सकता।
जस्टिस संजीव नरूला ने यह बात एक व्यक्ति के खिलाफ POCSO मामला रद्द करने से इनकार करते हुए कही। उस व्यक्ति की पत्नी ने कार्यवाही खत्म करने की मांग की, क्योंकि उनकी शादी हो चुकी हैं, उनका एक बच्चा हैं और वे खुशी-खुशी साथ रह रहे हैं।
जब महिला ने घर छोड़ा था, तब वह 18 साल से कम उम्र की थी और बाद में वह गर्भवती पाई गई। बाद में वह बालिग हुई, आरोपी से शादी की और उससे एक बच्चा हुआ। यह मामला उसकी माँ ने दर्ज कराया।
कोर्ट ने कहा कि 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012' (POCSO Act) की धारा 2(1)(d) के तहत बच्चे को 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति माना गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 3 के तहत, बच्चे के साथ पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट (यौन हमला) के मामले में सहमति का न होना कोई ज़रूरी शर्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"IPC की धारा 375 का छठा क्लॉज़ (Clause sixthly) भी 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ उसकी सहमति से या बिना सहमति के किए गए सेक्सुअल इंटरकोर्स को कवर करता है। सहमति रिश्ते को समझा सकती है, लेकिन यह कथित काम को कानून के दायरे से बाहर नहीं करती है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि संसद ने सोच-समझकर उम्र की एक समान सीमा तय की और कोर्ट किसी खास बच्चे की समझदारी या परिपक्वता के बारे में अपनी राय को कानून द्वारा तय किए गए नियम की जगह नहीं दे सकते।
कोर्ट ने कहा कि कानूनी सुरक्षा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि बहलाने-फुसलाने (Grooming), धोखे या ज़बरदस्ती का सबूत हो।
कोर्ट ने कहा,
"यहां याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया। मुख्य बात यह है कि उन हालात का न होना, अपने आप में, नाबालिग होने के दौरान सेक्सुअल इंटरकोर्स के आरोप का जवाब नहीं है। एक लंबे समय तक चलने वाला रिश्ता बाद में कानूनी सहमति नहीं दे सकता।"
इसके अलावा, जस्टिस नरूला ने दोनों पक्षों की बाद में हुई शादी को इस मामले में अहम नहीं माना। उन्होंने कहा कि शादी 29 सितंबर, 2025 को हुई थी, जब महिला 18 साल की हो चुकी है, लेकिन जिस यौन संबंध और प्रेग्नेंसी की बात हो रही है, वह तब की है जब वह नाबालिग थी।
कोर्ट ने कहा,
"बालीग होने पर उनकी शादी होने से नाबालिग रहते हुए हुए यौन संबंध की कानूनी स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शादी अभी भी चल रही हो, तब भी POCSO Act लागू रहेगा।
कोर्ट ने ध्यान दिया कि महिला ने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से आरोपी के साथ गई, उसे उससे कोई शिकायत नहीं थी, और उसकी माँ - जिनकी शिकायत पर FIR दर्ज हुई - ने भी शादी को स्वीकार कर लिया और वह केस आगे नहीं बढ़ाना चाहतीं।
इस पर कोर्ट ने कहा कि एक बालिग़ के तौर पर महिला की मौजूदा पसंद का "सम्मान किया जाना चाहिए"। हालांकि, कोर्ट ने उसकी मौजूदा पसंद का सम्मान करने और बचपन में किए गए कथित कामों के कानूनी नतीजों को तय करने के बीच फ़र्क किया।
कोर्ट ने कहा कि उसके रिश्ते को अपनी मर्ज़ी से बनाया गया बताने से प्रॉसिक्यूशन (मुकदमे) का आधार खत्म नहीं होता।
कोर्ट ने कहा,
"बताई गई वजहों से मुकदमा खत्म करने का मतलब होगा कि बाद में हुई शादी, माता-पिता बनना और परिवार की मंज़ूरी को उस सुरक्षा से ज़्यादा अहमियत देना जो उसे बचपन में मिलनी चाहिए।"
कोर्ट ने आगे कहा कि कानून द्वारा बच्चे को दी गई सुरक्षा "सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं हो सकती कि रिश्ता चलता है या नहीं, या उसे मंज़ूरी मिलती है या नहीं।"
यह देखते हुए कि महिला के नाबालिग होने के दौरान एक गंभीर अपराध किए जाने का शुरुआती आरोप है, कोर्ट ने कहा:
"कोर्ट राहत न देने के दर्दनाक नतीजों को समझता है: जिस महिला की सुरक्षा के लिए कानून का इस्तेमाल किया गया, वह अब इस कानूनी कार्यवाही को उस परिवार के लिए खतरा मानती है, जिसे वह बचाना चाहती है। उसकी चिंता को कानूनी तौर पर गैर-ज़रूरी नहीं माना जा सकता। फिर भी बच्चों की सुरक्षा इस कोर्ट के आकलन का मुख्य हिस्सा है। यहां दिखाई गई मुश्किल कोर्ट को ऐसे मुकदमे को खत्म करने के लिए नहीं मना सकती जो कानूनी तौर पर सही है।"
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने साफ़ किया कि ये बातें सिर्फ़ केस रद्द करने की मांग तक ही सीमित थीं और स्पेशल कोर्ट को आरोपों, सबूतों और कानून में उपलब्ध हर बचाव पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का निर्देश दिया।
Case Title : A v. THE STATE & ANR