दिल्ली हाईकोर्ट ने उन दो लोगों के खिलाफ समन रद्द करने से इनकार किया, जिन पर सुप्रीम कोर्ट परिसर में एक व्यक्ति के साथ मारपीट और बदसलूकी करने और बाद में इस घटना का वीडियो इंस्टाग्राम पर फैलाने का आरोप है।

जस्टिस मधु जैन को आदेश में कोई स्पष्ट गैर-कानूनी बात, मनमानी या कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं मिला, जिसके कारण आदेश में दखल देने की ज़रूरत हो। इसलिए उन्होंने दोनों आरोपियों की याचिका खारिज की।

यह घटना 30 जनवरी को हुई। शिकायत के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में शिकायतकर्ता के साथ मारपीट और बदसलूकी की और उसके बाद घटना का वीडियो इंस्टाग्राम पर फैला दिया।

शिकायत के बाद ट्रायल कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 131, 133, 351(2), 352 और 356 (धारा 3(5) के साथ) और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 की धारा 66C, 66D और 67 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया।

याचिकाकर्ताओं को ट्रायल का सामना करने के लिए समन भेजा गया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत कार्रवाई करने से इनकार किया।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने समन आदेश और शिकायत की कार्यवाही रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।

उनके वकील ने कहा कि यह कार्यवाही याचिकाकर्ताओं में से एक और शिकायतकर्ता के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद का नतीजा है।

यह तर्क दिया गया कि घटना तब हुई जब याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता से संपर्क किया। यह संपर्क याचिकाकर्ताओं में से एक के स्कूल जाने वाले बेटे के साथ कथित बातचीत और उसकी मां के बारे में कथित तौर पर की गई टिप्पणियों को लेकर था।

याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि कथित अपराधों के लिए उन्हें समन करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। यह भी कहा गया कि कथित इंस्टाग्राम अकाउंट सीधे तौर पर याचिकाकर्ताओं में से किसी से नहीं जुड़ा और खुद आदेश में भी इसके मालिक और इसे चलाने वाले व्यक्ति का सवाल ट्रायल के लिए खुला छोड़ दिया गया।

हालांकि, जस्टिस मधु जैन ने कार्यवाही में दखल देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि समन जारी करने के चरण में यह तय करने की ज़रूरत नहीं है कि आरोपों के कारण अंततः सजा होगी या नहीं। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने समन जारी करने का आदेश देने से पहले शिकायत और समन जारी करने से पहले के सबूतों पर विचार किया।

इसके अलावा, कोर्ट ने पार्टियों के बीच पहले हुए विवाद के आधार पर याचिकाकर्ताओं की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ पहले के विवादों का होना ही कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कहा,

"इसी तरह याचिकाकर्ता नंबर 1 द्वारा प्रतिवादी नंबर 2 के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत पर दाखिल क्लोजर रिपोर्ट अलग शिकायत से संबंधित है। इस चरण में इसे मौजूदा कार्यवाही के आरोपों के बारे में निर्णायक नहीं माना जा सकता।"

कथित इंस्टाग्राम अकाउंट के बारे में कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनमें से किसी एक को उस अकाउंट से जोड़ने वाला कोई सीधा सबूत नहीं है।

कोर्ट ने पाया कि जिस आदेश को चुनौती दी गई थी, उसमें अकाउंट के मालिक और उससे जुड़ाव के मुद्दे को कानून के अनुसार तय करने के लिए खुला छोड़ दिया गया।

कोर्ट ने कहा,

"क्या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को आखिरकार याचिकाकर्ता नंबर 1 से जोड़ा जा सकता है और उसका सबूत के तौर पर क्या महत्व है, ये ऐसे मामले हैं, जिन पर मौजूदा अधिकार क्षेत्र के तहत कार्यवाही में सबूतों का विस्तार से विश्लेषण करके कोई पक्का फैसला नहीं किया जा सकता है।"

कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं की दलीलें असल में कोर्ट से उस सामग्री का फिर से विश्लेषण करने और शुरुआती चरण में ही विवादित सवालों पर निष्कर्ष देने के लिए कह रही थीं।

कोर्ट ने कहा,

"अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए समन आदेश की जांच करते समय ऐसी प्रक्रिया न तो ज़रूरी है और न ही इसकी इजाज़त है।"

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में कही गई किसी भी बात को मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाएगा।

Title: MEENAL AGARWAL & ANR v. STATE OF NCT OF DELHI & ANR

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