दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पत्तियों, बीज और घास जैसी सामग्री से बना पदार्थ नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) के तहत 'गांजा' की परिभाषा में नहीं आता। कोर्ट ने 21.20 किलोग्राम कथित गांजा बरामदगी के मामले में आरोपी को नियमित जमानत दी।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पहली नजर में 21.20 किलोग्राम गांजे की कथित बरामदगी NDPS Act की धारा 37 के दायरे में आती प्रतीत हो सकती है लेकिन आरोपपत्र से पता चलता है कि बरामद सामग्री में केवल फूल या फल देने वाले ऊपरी हिस्से ही नहीं, बल्कि पत्तियों, बीज और घास जैसी सामग्री का मिश्रण भी शामिल था।

कोर्ट ने कहा कि NDPS Act की धारा 2(iii)(b) में गांजे की परिभाषा के तहत पत्तियां, बीज और घास जैसी सामग्री शामिल नहीं हैं। ऐसे में मौजूदा मामले में धारा 37 के लागू होने को लेकर संदेह पैदा होता है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बरामद सामग्री मिश्रित होने के कारण उसमें मौजूद 'फूल या फल देने वाले ऊपरी हिस्सों' की वास्तविक मात्रा कमर्शियल मात्रा के लिए निर्धारित सीमा से काफी कम होने की संभावना है।

मामला केशवपुरम थाना क्षेत्र में दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपी के खिलाफ NDPS Act की धाराओं 20, 25 और 29 के तहत मामला दर्ज किया गया। दिल्ली पुलिस के अनुसार, पिछले साल 1 सितंबर को आरोपी और अन्य व्यक्ति स्कूटी से जा रहे थे तभी उन्हें रोका गया। तलाशी के दौरान कथित तौर पर 21.20 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ जिसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया।

जमानत पर विचार करते हुए कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और ट्रायल पूरा होने में अभी समय लगने की संभावना है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी 1 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में है और एक साल से अधिक समय से जेल में है। नाममात्र रिकॉर्ड में उसका आचरण संतोषजनक बताया गया।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी के खिलाफ NDPS Act के तहत एक अन्य FIR भी दर्ज है लेकिन उस मामले में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने जमानत याचिका मंजूर की और आरोपी को 20 हजार रुपये के निजी मुचलके तथा इतनी ही राशि के एक जमानती के साथ ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि पर नियमित जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निपटारे के उद्देश्य से हैं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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