PMLA केस में विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना ज़मानत न देने का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के किसी मामले में आरोपी को ज़मानत देने से मना करने का आधार विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेना नहीं हो सकता।
जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने यह टिप्पणी PMLA के एक मामले में आरोपी को ज़मानत देते हुए की। यह मामला प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) और उसके राजनीतिक सहयोगी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) की कथित गतिविधियों से जुड़ा है।
अदालत ने वाहिदुर रहमान को ज़मानत देते हुए कहा,
“उस समय के संदर्भ में विरोध प्रदर्शन की गतिविधियों में हिस्सा लेना—भले ही विरोध का तरीका कितना भी अनुचित क्यों न रहा हो—इस चरण पर PMLA के तहत चल रहे मुकदमे में ज़मानत देने से मना करने का निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब आरोपों का मुख्य केंद्र याचिकाकर्ता द्वारा किए गए कथित वित्तीय लेन-देन हैं।”
अदालत ने पाया कि आरोपी पर लगे आरोप केवल 3.15 लाख रुपये के लेन-देन से जुड़े थे। यह तब है, जब ED ने आरोप लगाया कि 2010 से 2025 के बीच SDPI के खातों में 32.94 करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम आई थी।
ED ने आरोप लगाया कि रहमान—जिसे PFI में फिजिकल एजुकेशन ट्रेनर बताया गया था—ने कई बैंक अकाउंट्स के ज़रिए नकद जमा करके और फिर उन्हें SDPI के अकाउंट्स में ट्रांसफर करके पैसों की “लेयरिंग” (पैसे के स्रोत को छिपाने की प्रक्रिया) में मदद की थी।
एजेंसी ने उसके ईमेल ID और फ़ोन संपर्कों पर भी भरोसा किया, जो कथित तौर पर PFI और SDPI से जुड़े थे।
ज़मानत के चरण पर इस तरह की सामग्री पर ED के भरोसे को खारिज करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“जब कोई व्यक्ति किसी संगठन से पेशेवर या कार्यात्मक क्षमता में जुड़ा होता है—जैसा कि इस मामले में स्वीकार किया गया—तो यह न तो असामान्य है और न ही स्वाभाविक रूप से संदिग्ध कि वह ऐसे ईमेल ID या संपर्क विवरण रखेगा, जिनमें उस संगठन का नाम शामिल हो।”
अदालत ने पाया कि हालांकि ECIR (प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट) 2022 में दर्ज की गई, लेकिन रहमान का नाम पहली बार मई 2025 में दायर सातवीं पूरक अभियोजन शिकायत में ही आया था।
PFI पर प्रतिबंध के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में आरोपी के हिस्सा लेने से जुड़े ED के आरोपों पर अदालत ने कहा कि ये आरोप उस समय से संबंधित थे, जब PFI को “गैर-कानूनी संगठन” घोषित नहीं किया गया। इसलिए PMLA के तहत चल रहे मुकदमे में ज़मानत देने से मना करने के लिए इन आरोपों को निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि रहमान एक साल और दो महीने से ज़्यादा समय से जेल में बंद थे, जबकि मामला अभी भी 'आरोप तय करने पर बहस' के चरण में ही था। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने सात शिकायतों में लगभग 250 गवाहों और 600 से ज़्यादा दस्तावेज़ों का हवाला दिया था।
तदनुसार, अदालत ने कुछ शर्तों के अधीन रहमान को नियमित ज़मानत दी।
Title: WAHIDUR RAHMAN v. ED