UAPA जांच अवधि 90 से 180 दिन बढ़ाने का आदेश अपील योग्य नहीं, केवल डिफॉल्ट जमानत का अधिकार टलता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जांच की अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन करने का आदेश अंतरिम (Interlocutory) आदेश है और इसके खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) अधिनियम की धारा 21 के तहत अपील नहीं की जा सकती।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की खंडपीठ ने कहा कि ऐसा आदेश आरोपी के किसी अंतिम अधिकार का निर्णय नहीं करता, बल्कि डिफॉल्ट जमानत के अधिकार को केवल कुछ समय के लिए स्थगित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अवधि बढ़ने पर डिफॉल्ट जमानत का अधिकार समाप्त नहीं होता, बल्कि 91वें दिन के बजाय 181वें दिन उपलब्ध होता है।
मामला विशेष NIA अदालत के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें UAPA की धारा 43D(2)(b) के तहत जांच पूरी करने के लिए NIA को 90 दिनों के बजाय 180 दिनों का समय दिया गया था। यह मामला 13 मार्च को दर्ज FIR से संबंधित है, जिसमें छह यूक्रेनी नागरिकों पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने और म्यांमार में हमलों की साजिश रचने का आरोप है।
आरोपियों ने तर्क दिया कि जांच अवधि बढ़ाने के आदेश से उनका डिफॉल्ट जमानत का वैधानिक अधिकार प्रभावित हुआ है, इसलिए यह आदेश अपील योग्य है। वहीं NIA ने कहा कि यह केवल एक अंतरिम आदेश है, जिसके खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं है।
हाईकोर्ट ने NIA की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि जांच अवधि बढ़ाने का आदेश केवल ट्रायल कोर्ट के विवेकाधिकार का प्रयोग है और इसे चुनौती देने का उचित उपाय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत न्यायिक समीक्षा है, न कि NIA अधिनियम के तहत अपील।
इसी आधार पर अदालत ने अपील को धारा 482 CrPC/धारा 528 BNSS के तहत याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया।