बिना मेडिकल जरूरत बच्चे को अस्पताल में भर्ती रख सकते हैं? दिल्ली हाईकोर्ट करेगा जांच
दिल्ली हाईकोर्ट यह जांच करेगा कि कानून के उल्लंघन के आरोप में किशोर (Child in Conflict with Law) को बिना किसी मेडिकल जरूरत के मनोचिकित्सकीय जांच के लिए अस्पताल में भर्ती रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है या नहीं। कोर्ट यह भी तय करेगा कि ऐसी जांच के दौरान क्या किशोर को उसके प्राकृतिक अभिभावक से अलग रखा जा सकता है।
जस्टिस मधु जैन ने एक किशोर की याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में POCSO Act के स्पेशल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें किशोर को इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज (IHBAS) में इन-पेशेंट के तौर पर भर्ती कराकर मनोचिकित्सकीय जांच कराने का निर्देश दिया गया।
याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या मनोचिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक और बहु-विषयक जांच डे-केयर आधार पर की जा सकती है ताकि किशोर को रात के समय अस्पताल में भर्ती या वहां रहने के लिए बाध्य न किया जाए।
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से यह सवाल है कि बिना किसी मेडिकल आवश्यकता के कानून के उल्लंघन के आरोप में किशोर को अस्पताल में भर्ती रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है या नहीं। दूसरा सवाल यह है कि जांच के दौरान क्या उसे उसके प्राकृतिक अभिभावक से अलग किया जा सकता है।
याचिका में विवादित आदेश में संशोधन की मांग करते हुए IHBAS को निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि किशोर की मनोचिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक और बहु-विषयक जांच डे-केयर आधार पर की जाए और उसे अस्पताल में भर्ती रखे बिना जांच पूरी की जाए।
याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि जांच उसके प्राकृतिक अभिभावक या वकील की मौजूदगी में ही कराई जाए और उनकी अनुपस्थिति में जांच का कोई हिस्सा आगे न बढ़ाया जाए।
हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए मामले में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अगली सुनवाई तक अपीलीय अदालत के समक्ष चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाई।
मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी।