फंड संभालने वाले कर्मचारियों पर भरोसा टूटे तो बर्खास्तगी जायज: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-10 09:58 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि “लॉस ऑफ कॉन्फिडेंस” (विश्वास का समाप्त होना) का सिद्धांत उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, जहां कर्मचारी को वित्तीय जिम्मेदारियां सौंपी गई हों। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वित्तीय अनियमितताओं जैसे सिद्ध कदाचार से विश्वास टूट जाता है, तो नियोक्ता को उस कर्मचारी को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

जस्टिस शैल जैन ने कहा:

“जहां कर्मचारी वित्तीय कार्यों में संलग्न होता है, वहां विश्वास का महत्व अधिक होता है। एक बार यह विश्वास टूट जाए, तो नियोक्ता को संबंध जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने इस आधार पर एक कर्मचारी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने वित्तीय अनियमितताओं और गबन के आरोप में अपनी नौकरी से निकाले जाने को चुनौती दी थी।

मामला क्या था?

याचिकाकर्ता दिल्ली स्टेट कोऑपरेटिव यूनियन लिमिटेड में सेल्स क्लर्क के पद पर कार्यरत था। उस पर कई वर्षों तक नकद राशि का सही हिसाब न देने का आरोप था।

उसने इस मामले को इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, जहां ट्रिब्यूनल ने उसकी बर्खास्तगी को सही ठहराया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।

कोर्ट की टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि—

ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष ठोस दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित थे

आंतरिक जांच रिकॉर्ड और याचिकाकर्ता के खुद के लिखित नोट्स में गड़बड़ियों की स्वीकारोक्ति थी

कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि ये स्वीकारोक्ति दबाव में ली गई थी।

कोर्ट ने कहा कि यह कोई एक बार की गलती नहीं थी, बल्कि लगातार तीन वर्षों तक वित्तीय अनियमितताएं हुई थीं।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“बाद में गबन की राशि जमा कर देने से पहले किया गया कदाचार समाप्त नहीं हो जाता।”

फैसला

कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी और उसकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

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