दिल्ली हाईकोर्ट ने ₹22 करोड़ के 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम में ज़मानत देने से किया इनकार, कहा - इसका समाज पर बहुत बुरा असर पड़ता है

Update: 2026-04-23 04:38 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने ₹22 करोड़ के "डिजिटल अरेस्ट" साइबर धोखाधड़ी मामले में चार आरोपियों को ज़मानत देने से इनकार किया। यह मामला एक बुज़ुर्ग नागरिक से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराधों का समाज पर बहुत बुरा असर पड़ता है और इनसे सख्ती से निपटना ज़रूरी है।

जस्टिस मनोज जैन ने दो आरोपियों की नियमित ज़मानत याचिकाएं और दो अन्य की अग्रिम ज़मानत याचिकाएं खारिज कीं। उन्होंने कहा कि इस समय अगर इन्हें रिहा किया गया तो चल रही जाँच में रुकावट आ सकती है।

यह मामला 70 साल से ज़्यादा उम्र के एक बुज़ुर्ग के साथ हुई धोखाधड़ी से जुड़ा है। धोखेबाज़ों ने खुद को टेलीकॉम अधिकारी और बाद में कानून लागू करने वाली एजेंसियों के अधिकारी बताकर उन्हें ठगा। पीड़ित को वीडियो कॉल के ज़रिए मानसिक रूप से डराया-धमकाया गया। उन्हें यह यकीन दिलाया गया कि वे किसी बड़े आर्थिक और टेरर-फंडिंग (आतंकवाद के लिए पैसे जुटाने) के अपराध में शामिल हैं, और उन्हें कुछ समय तक लगातार पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।

सरकारी वकील के मुताबिक, पीड़ित से कई लेन-देन के ज़रिए कुल ₹22.92 करोड़ की रकम ठग ली गई। इसमें से ₹1.90 करोड़ की रकम एक आरोपी से जुड़े बैंक खाते के ज़रिए भेजी गई। आरोप है कि इस खाते का इस्तेमाल पैसे ट्रांसफर करने और निकालने के लिए एक "म्यूल अकाउंट" (धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल होने वाले खाते) के तौर पर किया गया।

जांच ​​के दौरान, पुलिस ने ऐसे लोगों के नेटवर्क का पता लगाया, जो कथित तौर पर मिलकर काम कर रहे थे। इस नेटवर्क में वे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने बैंक अकाउंट् उपलब्ध कराए, लेन-देन में मदद की और पैसे ठगने में सहायता की। सरकारी वकील ने दावा किया कि आरोपी एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थे और ठगी गई रकम अभी तक बरामद नहीं हुई।

ज़मानत का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने अपराध की गंभीरता पर ज़ोर दिया और बताया कि जांच अभी भी चल रही है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने हाल ही में इस तरह के मामलों की जाँच अपने हाथ में ली।

कोर्ट ने कहा कि "डिजिटल अरेस्ट" की घटनाएं, खासकर बुज़ुर्ग नागरिकों को निशाना बनाने वाली घटनाएं, लगातार बढ़ रही हैं और इनके समाज पर दूरगामी परिणाम होते हैं।

कोर्ट ने कहा,

"इन मामलों से बहुत ज़्यादा संवेदनशीलता और एक अलग नज़रिए के साथ निपटना होगा, क्योंकि ये अपराध न केवल जनता के भरोसे और विश्वास को तोड़ते हैं, बल्कि पूरे समाज पर बुरा असर डालते हैं।"

इस दलील खारिज करते हुए कि कुछ आरोपियों की भूमिका सीमित या मामूली थी, कोर्ट ने कहा कि जटिल साइबर धोखाधड़ी के मामलों में साज़िश को अंजाम देने में हर भागीदार की अहम भूमिका होती है।

आगे कहा गया,

“विचाराधीन अपराध एक संगठित अपराध है, जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। डिजिटल गिरफ़्तारी से जुड़े किसी भी घोटाले में शामिल हर व्यक्ति, किसी न किसी रूप में, एक अहम भूमिका निभाता है… इस चरण पर आवेदकों को पीड़ित, मामूली खिलाड़ी, या केवल 'म्यूल अकाउंट' (अवैध लेन-देन के लिए इस्तेमाल होने वाले खाते) रखने वाले या उपलब्ध कराने वाले के तौर पर नहीं देखा जा सकता। उनकी भूमिकाओं को केवल गौण या बाहरी नहीं कहा जा सकता। वे इस साज़िश के पहिये के महत्त्वपूर्ण पुर्ज़े प्रतीत होते हैं। उनकी संलिप्तता के बिना यह पहिया आगे नहीं बढ़ पाता।”

अतः, न्यायालय ने चारों ज़मानत अर्जियाँ ख़ारिज कीं।

Case title: Ashok Kumar v. State

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