वाइल्ड विच हंट: जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े नकदी मामले में CBI जांच की मांग खारिज
दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास में आग लगने के दौरान कथित तौर पर बिना हिसाब वाली नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI या विशेष जांच दल से जांच कराने की मांग वाली याचिका सोमवार को खारिज की।
जस्टिस अमित बंसल ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए इसे वाइल्ड विच हंट यानी बेबुनियाद तरीके से किसी के पीछे पड़ने वाली कोशिश बताया।
अधिवक्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय ने यह याचिका दाखिल की थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बंसल ने कहा,
“मैं इस पर सुनवाई नहीं कर रहा हूं। यह वाइल्ड विच हंट है। आपके पास करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं है?”
मामले में संबंधित प्राधिकरणों की ओर से याचिकाकर्ता के याचिका दाखिल करने के अधिकार पर सवाल उठाया गया। यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के पास अन्य प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। इसके बाद उपाध्याय ने याचिका वापस लेने और वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता देने का अनुरोध किया। हालांकि अदालत ने अंततः याचिका खारिज की।
यह मामला 14 मार्च 2025 को हुई उस घटना से जुड़ा है, जब तत्कालीन जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद आग बुझाने की कार्रवाई के दौरान परिसर के एक बाहरी हिस्से में बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की बात सामने आई। नकदी को लेकर उठे सवालों के बाद इस घटना ने व्यापक सार्वजनिक विवाद का रूप ले लिया।
घटना के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने तीन जजों की आंतरिक जांच समिति गठित की। समिति में तत्कालीन पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया और जांच लंबित रहने तक उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया। समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को सौंपी थी। रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया जस्टिस वर्मा की जिम्मेदारी सामने आने की बात कही गई। इसके बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने रिपोर्ट आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी। यह कदम जस्टिस वर्मा द्वारा चीफ जस्टिस की इस्तीफा देने की सलाह नहीं मानने के बाद उठाया गया।
सार्वजनिक पारदर्शिता की दिशा में कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बाद में आग की घटना से जुड़े रिपोर्ट और दस्तावेज सार्वजनिक किए। इनमें जलती हुई नकदी से संबंधित तस्वीरें और वीडियो भी शामिल हैं।
जस्टिस वर्मा ने आंतरिक जांच और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज की। इसके बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की ओर से जांच समिति गठित किए जाने के फैसले को भी चुनौती दी, लेकिन उनकी यह याचिका भी इस वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की।
इसके बाद लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को लेकर जांच की कार्यवाही शुरू हुई। इसी दौरान उन्होंने भारत के राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनका इस्तीफा उस समय हुआ जब लोकसभा द्वारा उनके खिलाफ हटाने के प्रस्ताव के तहत गठित समिति की जांच चल रही थी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पिछले वर्ष जज जांच अधिनियम, 1968 के तहत जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति को उनके सरकारी आवास में कथित तौर पर बिना हिसाब वाली नकदी मिलने के आरोपों की जांच करनी थी।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में उपाध्याय ने कहा कि मामला केवल FIR दर्ज नहीं किए जाने तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति केवल इसलिए सामान्य आपराधिक कानून की जांच से बाहर हो सकता है, क्योंकि उसने पहले कोई उच्च संवैधानिक पद संभाला है।
याचिका में कहा गया कि इसका उद्देश्य न्यायपालिका को बदनाम करना या जस्टिस वर्मा के खिलाफ पहले से दोष तय करना नहीं है। याचिकाकर्ता के अनुसार, न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही संवैधानिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। स्वतंत्रता न्यायिक कार्यों की रक्षा करती है, लेकिन किसी ऐसे कृत्य की जांच से छूट नहीं दे सकती, जो किसी अन्य लोक सेवक द्वारा किए जाने पर सामान्य आपराधिक कानून के तहत जांच का विषय बन सकता है।
उपाध्याय ने कहा कि वह जस्टिस वर्मा को दोषी घोषित करने की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई का पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच चाहते हैं।
याचिका में जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग करते हुए यह भी कहा गया कि अप्रैल 2026 में उनके सेवानिवृत्त होने के बाद जज संरक्षण अधिनियम, 1985 के तहत गिरफ्तारी से संबंधित संरक्षण का प्रश्न नहीं रह जाता।
इस मामले में इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 7 अगस्त को उपाध्याय की ओर से दाखिल इसी तरह की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका दाखिल की गई।