गांजे के पत्ते और डंठल 'गांजा' नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने NDPS केस में ज़मानत दी, कमर्शियल मात्रा पर संदेह जताया
दिल्ली हाईकोर्ट ने ड्रग्स के एक मामले में आरोपी को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि गांजे के पत्तों और डंठलों को कमर्शियल मात्रा (व्यावसायिक मात्रा) तय करने के लिए 'गांजा' नहीं माना जा सकता। इस तरह, कोर्ट ने इस बात पर संदेह जताया कि क्या ज़ब्त की गई चीज़ें NDPS Act की धारा 37 के तहत तय की गई सख्त सीमा के दायरे में आती हैं।
कोर्ट ने कहा कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) के तहत 'गांजा' की परिभाषा में खास तौर पर सिर्फ गांजे के पौधे के फूल वाले या फल वाले ऊपरी हिस्से ही शामिल हैं। इसमें बीज और पत्ते तब तक शामिल नहीं माने जाते, जब तक वे फूल वाले या फल वाले ऊपरी हिस्सों के साथ न हों।
इस मामले में सरकारी वकील ने ज़ब्त की गई चीज़ों के कुल वज़न के आधार पर यह दलील दी थी कि यह 'कमर्शियल मात्रा' है।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि ज़ब्त की गई चीज़ों में कथित तौर पर पत्ते, डंठल और पौधे के अन्य ऐसे हिस्से भी शामिल हैं, जिन पर कोई रोक नहीं है। इससे इस बात पर संदेह पैदा हो गया कि क्या असल में जो नशीला पदार्थ (गांजा) ज़ब्त हुआ, उसका वज़न कमर्शियल मात्रा की तय सीमा तक पहुंचता है या नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"यह साफ है कि ज़ब्त की गई चीज़ों में सिर्फ 'फूल वाले या फल वाले ऊपरी हिस्से' ही शामिल नहीं थे, क्योंकि ज़ब्ती मेमो (Seizure Memo) में खुद 'सूखे पत्ते और छोटी डालियों' का ज़िक्र है। ज़ब्त नशीले पदार्थ का वज़न 21.95 किलोग्राम है, जो गांजे की कमर्शियल मात्रा की तय सीमा [20 किलोग्राम और उससे ज़्यादा] से बस थोड़ा ही ज़्यादा है।"
इस मामले में 'रवीना कुमारी बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2024)' मामले का हवाला दिया गया। उस मामले में हाईकोर्ट ने एक वेन डायग्राम (venn diagram) की मदद से समझाया था कि अगर ज़ब्त की गई चीज़ें एक ऐसा मिला-जुला मिश्रण हैं, जिसमें फूल वाली कलियां और फल वाले ऊपरी हिस्से, पत्तों/बीजों और डंठलों के साथ मिले हुए हैं, तो डंठल/पत्ते/तना जैसे बेकार हिस्से (Placebo Material) नशीले पदार्थ का असल हिस्सा नहीं माने जाएंगे। नशीले पदार्थ की मात्रा (छोटी मात्रा या कमर्शियल मात्रा) तय करने के लिए सिर्फ नशीले पदार्थ का असल हिस्सा और उसका वज़न (यानी फूल वाली कलियाँ और फल वाले ऊपरी हिस्से) ही मायने रखेगा।
इस मामले में मौजूद अस्पष्टता को देखते हुए कोर्ट ने यह फैसला दिया कि ज़मानत पर सुनवाई के इस चरण में इस तरह के संदेह का फ़ायदा आरोपी को ही मिलना चाहिए। यह बात खास तौर पर इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि NDPS Act की धारा 37 के तहत कमर्शियल मात्रा वाले मामलों में ज़मानत देने के लिए बहुत ही सख्त शर्तें तय की गईं। अदालत ने यह भी पाया कि ज़ब्त किए गए पदार्थ की सटीक प्रकृति और बनावट का निर्धारण करने के लिए ट्रायल के दौरान सबूतों की ज़रूरत होगी। इस चरण पर बरामद की गई पूरी सामग्री को निर्णायक रूप से "गांजा" मान लेना अनुचित होगा।
अतः, अदालत ने यह माना कि धारा 37 के कड़े प्रावधान सख्ती से लागू नहीं हो सकते, और आरोपी को ज़मानत दे दी।
Case title: Mujabil v. GNCTD