हाईकोर्ट का दिल्ली कोर्ट्स से आग्रह: 'अस्वाभाविक मौत' से जुड़े मामलों में FIR दर्ज करने की अर्जियों पर तेज़ करें सुनवाई

Update: 2026-06-03 04:20 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने उन मामलों में FIR दर्ज करने में हो रही देरी पर चिंता जताई है, जिनमें कम उम्र की शादीशुदा महिलाओं की अस्वाभाविक मौत हुई हो।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अदालतों से आग्रह किया कि वे उन अर्जियों को ज़्यादा प्राथमिकता दें, जिनमें FIR दर्ज करने की मांग की गई हो और जहां दहेज से जुड़ी प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हों, लेकिन पुलिस समय पर कार्रवाई करने में नाकाम रही हो।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट को उम्मीद है कि भविष्य में FIR दर्ज करने के निर्देश मांगने वाली अर्जियों पर—खासकर उन मामलों में जहां शादी के कुछ ही समय बाद किसी कम उम्र की महिला की अस्वाभाविक मौत हो गई हो, और जहां दहेज से जुड़ी प्रताड़ना के आरोप हों, लेकिन पुलिस FIR दर्ज करने में नाकाम रही हो—अदालतें ज़्यादा तेज़ी से सुनवाई करेंगी और उन्हें जल्द-से-जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगी ताकि FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का मामला महीनों तक अनसुलझा न पड़ा रहे।"

कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब वह दहेज से जुड़ी मौत के मामले में पति और उसके माता-पिता की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर रहा था; इस मामले में शादी के छह महीने के भीतर ही एक कम उम्र की महिला की मौत हो गई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि शोक में डूबे माता-पिता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपनी बेटी की मौत के सदमे से जूझते हुए तुरंत ही क्रूरता और दहेज से जुड़ी प्रताड़ना की हर घटना का पूरा ब्योरा दे दें।

कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 और 85 के तहत दर्ज FIR में आरोपी पति, ससुर और सास की अग्रिम ज़मानत याचिकाएं खारिज कीं।

मृतक महिला की मौत जुलाई 2025 में हुई थी—कथित तौर पर फांसी लगाकर—और यह घटना उसकी शादी के कुछ ही महीनों के भीतर हुई। हालांकि, FIR इस साल मार्च में ही दर्ज हो पाई और वह भी एक मजिस्ट्रेट के निर्देश के बाद।

आरोपियों ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि मृतक के माता-पिता ने मौत के तुरंत बाद एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए अपने बयानों में दहेज से जुड़ी प्रताड़ना के कोई विस्तृत आरोप नहीं लगाए, और यह कि बाद में दी गई शिकायत—जिसमें विशिष्ट आरोप लगाए गए—वह बाद में सोच-समझकर गढ़ी गई बात थी।

इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि कानून शोक में डूबे उन माता-पिता से—जो अपनी मृत बेटी के शव के पास खड़े हों—यह मांग नहीं कर सकता कि वे उस कठिन घड़ी में ही क्रूरता और प्रताड़ना की हर घटना का पूरा और विस्तृत ब्योरा दे दें।

कोर्ट ने पूछा,

“क्या किसी शोकाकुल माता-पिता से ऐसी क्षति के कुछ ही घंटों के भीतर उन सभी घटनाओं का पूरा और विस्तृत ब्योरा देने की उम्मीद की जा सकती है, जिन्होंने उनकी बेटी की दुर्भाग्यपूर्ण मौत में भूमिका निभाई हो?”

जस्टिस शर्मा ने FIR दर्ज होने में हुई देरी का भी गंभीरता से संज्ञान लिया और यह टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता-पिता ने अधिकारियों से तुरंत संपर्क किया था, लेकिन उन्हें आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू करवाने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने पर मजबूर होना पड़ा।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“एक युवती की अप्राकृतिक मौत के संबंध में FIR दर्ज होने में उसकी शादी की पूरी अवधि से भी ज़्यादा समय लगा।”

पुलिस की कार्रवाई पर चिंता व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे यह जानकर हैरानी हुई कि अपराध स्थल पर टूटी हुई चूड़ियां और पायल के टुकड़े मिलने के बावजूद, कोई FIR दर्ज नहीं की गई और मामला महीनों तक केवल जाँच के चरण में ही अटका रहा।

कोर्ट ने कहा,

“इसके बावजूद, यह चौंकाने वाली बात है कि पुलिस ने तब भी यह उचित नहीं समझा कि इस मामले में जांच और FIR दर्ज करने की ज़रूरत है। नतीजतन, आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया और जांच अभी भी तब शुरू होनी बाकी है, जब आरोपी जाँच में शामिल हों—जो उन्होंने आज तक नहीं किया।”

आरोपों की गंभीरता,इस तथ्य कि मौत शादी के कुछ ही महीनों के भीतर हुई, और यह कि जांच अभी भी शुरुआती चरण में थी—इन सभी बातों पर विचार करते हुए कोर्ट ने यह माना कि हिरासत में पूछताछ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे यह भी नोट किया कि मृतका के माता-पिता ने अधिकारियों से संपर्क किया, कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए। उसके बाद संबंधित SHO को एक विस्तृत शिकायत भी सौंपी; लेकिन अंततः उन्हें FIR दर्ज करवाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ा।

कोर्ट ने कहा,

“रिकॉर्ड से ही यह स्पष्ट होता है कि माननीय मजिस्ट्रेट ने इस बात को ज़रूरी समझा कि इस मामले को जिस तरीके से संभाला गया, उसके संबंध में बार-बार स्पष्टीकरण मांगा जाए और संबंधित DCP ने कोर्ट को सूचित किया कि दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई।”

कोर्ट ने आगे कहा,

हालांकि, एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह भी है कि मृतका के पिता को अपनी जवान बेटी की अप्राकृतिक मौत के संबंध में FIR दर्ज करवाने और जांच शुरू करवाने के लिए दर-दर भटकना पड़ा।

Title: SANDEEP @ SUNNY v. STATE & other connected matters

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