बिना सोचे-समझे किसी छोटे संदिग्ध ट्रांजैक्शन के लिए बैंक पूरे अकाउंट को फ्रीज नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक किसी व्यक्ति के पूरे खाते को केवल एक छोटे संदिग्ध ट्रांजैक्शन के आधार पर पूरी तरह से फ्रीज नहीं कर सकता। ऐसा करने से पहले बैंक को 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) का पालन करना चाहिए और मामले पर ठीक से विचार करना चाहिए।
जस्टिस जसमीत सिंह ने यह टिप्पणी रुक्मणी सिंह नाम की महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। महिला ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में मौजूद अपने बचत खाते को अनफ्रीज (चालू) कराने की मांग की थी।
कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि वह रुक्मणी सिंह को अपना खाता इस्तेमाल करने की अनुमति दे, लेकिन विवादित राशि 2,650 रुपये पर बैंक का 'लीन' (lien - यानी उस राशि को होल्ड पर रखना) बना रहेगा।
यह अकाउंट साइबर क्राइम पोर्टल पर दर्ज शिकायतों और महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा कर्नाटक की पुलिस से मिली मांगों के आधार पर फ्रीज किया गया। अकाउंट फ्रीज करने से पहले महिला को कोई पूर्व सूचना (नोटिस) भी नहीं दी गई।
कोर्ट ने गौर किया कि विवादित राशि केवल 2,650 रुपये थी, जबकि याचिकाकर्ता का पूरा बैंक खाता ही फ्रीज कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा,
"मेरा मानना है कि अकाउंट को फ्रीज करना एक ऐसा कदम है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे याचिकाकर्ता को काफी कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।"
कोर्ट ने आगे कहा कि बैंक को 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' का पालन किए बिना और मामले पर ठीक से विचार किए बिना इतने कठोर कदम उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बहुत छोटी राशि वाले संदिग्ध ट्रांजैक्शन के लिए पूरे अकाउंट को फ्रीज कर देने से याचिकाकर्ता को ऐसा नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई पैसों से नहीं की जा सकती।
प्रथम दृष्टया मामले और सुविधा के संतुलन (Balance of Convenience) को देखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि रुक्मणी सिंह को अपना बैंक अकाउंट इस्तेमाल करने दिया जाए, जबकि 2,650 रुपये की विवादित राशि पर बैंक का 'लीन' बना रहेगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवादित राशि को अनफ्रीज कराने के लिए, महिला लागू 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (SOP) के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल कर सकती है।
Case Title : Rukmani Singh v. Union of India & Ors