दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने Oriental Insurance पर लगाया ₹11.79 लाख से अधिक भुगतान का आदेश, क्लेम में नई कटौती को माना सेवा में कमी
दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-I (नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट) ने Oriental Insurance Company Ltd. को बीमा क्लेम के पुनर्मूल्यांकन में सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी किसी पुराने आदेश में बताई गई गणना संबंधी गलती सुधारने के निर्देश का इस्तेमाल पूरे मामले को दोबारा खोलने या देय राशि कम करने के लिए नया आधार जोड़ने के अवसर के रूप में नहीं कर सकती।
आयोग के अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार तथा सदस्य अश्वनी कुमार मेहता और हरप्रीत कौर चर्या की पीठ ने बीमा कंपनी को ₹11,79,813.15 का भुगतान करने का निर्देश दिया। इस राशि पर 1 जुलाई 2009 से वास्तविक भुगतान तक 9% सालाना ब्याज भी देना होगा।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने उत्पीड़न और मानसिक परेशानी के लिए ₹1 लाख तथा मुकदमे के खर्च के रूप में ₹55,000 देने का निर्देश दिया। बीमा कंपनी को पहले के आदेश के तहत निर्धारित ₹50,000 मुआवजा और ₹20,000 मुकदमे का खर्च भी लागू ब्याज सहित देना होगा। आयोग ने बीमा कंपनी को कदाचार के लिए दिल्ली के उपभोक्ता कल्याण कोष में ₹1 लाख जमा करने का भी निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह शिकायत M/s Krishna Jute Company के प्रोपराइटर सुशील गुप्ता ने Oriental Insurance Company Ltd. के खिलाफ दर्ज कराई थी। मामला 21 अप्रैल 2008 को लगी आग से संबंधित था, जिसमें शिकायतकर्ता के स्टॉक, मशीनरी और अन्य संपत्ति को नुकसान पहुँचा था।
शिकायतकर्ता ने बीमा क्लेम के आकलन में हेसियन कपड़े की क्षतिग्रस्त गांठों की मात्रा की गणना में गलती का आरोप लगाया था।
24 नवंबर 2015 के अपने पहले के आदेश में उपभोक्ता आयोग ने सेवा में कमी पाते हुए बीमा कंपनी को क्षतिग्रस्त गांठों की मात्रा से संबंधित गणना की गलती निर्धारित समय के भीतर सुधारने का निर्देश दिया था। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि आदेश का पालन न होने पर शिकायतकर्ता दोबारा आयोग का रुख कर सकता है।
हालाँकि, शिकायतकर्ता के अनुसार, बीमा कंपनी ने केवल गणना की गलती सुधारने के बजाय संजय द्विवेदी एंड एसोसिएट्स से नया आकलन कराया। इस पुनर्मूल्यांकन में 34.67% अंडर-इंश्योरेंस का नया आधार जोड़ा गया और कुल जोखिम का आकलन ₹30,61,515 किया गया।
शिकायतकर्ता ने इस आधार पर नए आकलन को चुनौती दी कि बीमा कंपनी पहले के आदेश के दायरे से बाहर चली गई थी।
बीमा कंपनी ने क्या दलील दी?
Oriental Insurance Company ने शिकायत को गलत बताते हुए कहा कि उसने पहले के आदेश का पालन किया था। कंपनी के अनुसार, संबंधित रिकॉर्ड की जाँच के बाद सर्वेयर नियुक्त कर क्लेम का दोबारा आकलन कराया गया था।
बीमा कंपनी ने सर्वेयर की रिपोर्ट के महत्व को लेकर न्यायिक फैसलों का भी हवाला दिया।
आयोग की अहम टिप्पणियाँ
आयोग ने कहा कि पहले के आदेश में दी गई स्वतंत्र रूप से दोबारा शिकायत करने की अनुमति असीमित नहीं थी। वह केवल क्षतिग्रस्त कपड़े की गांठों की मात्रा की गणना में पहचानी गई गलती को सुधारने तक सीमित थी।
पीठ ने गौर किया कि 34.67% अंडर-इंश्योरेंस का आधार पहले के निर्णय का हिस्सा नहीं था। इसे बाद में नए आकलन के दौरान जोड़ा गया था।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जिनमें Saurashtra Chemicals Ltd. v. National Insurance Co. Ltd., JSK Industries Pvt. Ltd. v. Oriental Insurance Co. Ltd. और Sri Venkateswara Syndicate v. Oriental Insurance Co. Ltd. शामिल हैं, पर भरोसा करते हुए कहा कि बीमा कंपनी पहले से तय विवाद के दायरे से बाहर नहीं जा सकती।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेश को बाद की प्रशासनिक कार्रवाई या सर्वेक्षण के माध्यम से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। आदेश का पालन उसके वास्तविक उद्देश्य और भावना के अनुरूप होना चाहिए।
आयोग का अंतिम आदेश
शिकायतकर्ता के पक्ष में निर्णय देते हुए आयोग ने Oriental Insurance Company Ltd. को निम्न निर्देश दिए:
- ₹11,79,813.15 का भुगतान 1 जुलाई 2009 से वास्तविक भुगतान तक 9% सालाना ब्याज सहित किया जाए।
- मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए ₹1 लाख दिए जाएँ।
- मुकदमे के खर्च के रूप में ₹55,000 का भुगतान किया जाए।
- पहले के आदेश के तहत निर्धारित ₹50,000 मुआवजा और ₹20,000 मुकदमे का खर्च भी लागू ब्याज सहित दिया जाए।
- कदाचार के लिए दिल्ली के उपभोक्ता कल्याण कोष में ₹1 लाख जमा किए जाएँ।
आयोग ने बीमा कंपनी के आचरण को निरंतर और स्वतंत्र रूप से सेवा में कमी माना।