बेलगावी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Force Motors Citiline STD बस में खरीद के करीब दो महीने के भीतर गंभीर तकनीकी समस्याएँ सामने आने के मामले में डीलर Arihant Motors Pvt. Ltd. और निर्माता Force Motors Pvt. Ltd. को सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

आयोग ने शिकायतकर्ता मुगुंडप्पा की शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दोनों कंपनियों को संयुक्त रूप से बस को उसी ब्रांड के नए वाहन से बदलने का निर्देश दिया। यदि वाहन नहीं बदला जाता है, तो कंपनियों को ₹15 लाख की राशि 6% सालाना ब्याज के साथ वापस करनी होगी। इसके अतिरिक्त, मानसिक परेशानी के लिए ₹10,000 और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹5,000 देने का भी निर्देश दिया गया है।

आयोग के अध्यक्ष संजीव वी. कुलकर्णी और सदस्य एस. के. कड्रोलिमठ की पीठ ने आदेश का अनुपालन 45 दिनों के भीतर करने को कहा।

क्या था मामला?

शिकायतकर्ता मुगुंडप्पा बेलगावी के निवासी हैं और पेशे से ड्राइवर हैं। उन्होंने Arihant Motors Pvt. Ltd. से ₹16 लाख में Force Motors Citiline STD बस खरीदी थी। वाहन पर निर्माता की ओर से दो साल की वारंटी भी थी।

शिकायतकर्ता के अनुसार, बस लगभग 9,000 किलोमीटर चलने के बाद ही गंभीर तकनीकी समस्याओं का सामना करने लगी। खरीद के करीब दो महीने के भीतर इंजन ओवरहीट होने, कूलेंट लीक होने और इंजन सीज होने जैसी समस्याएँ सामने आईं।

27 मई 2024 को वाहन को अधिकृत सर्विस सेंटर पर मरम्मत के लिए ले जाया गया, लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप था कि मरम्मत के बावजूद समस्याएँ दोबारा सामने आईं

10 जून 2024 को बस में फिर से ओवरहीटिंग और इंजन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हुईं, जिसके बाद उसे दोबारा सर्विस सेंटर ले जाना पड़ा।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वाहन में अंतर्निहित मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट था। उन्होंने वाहन बदलने या खरीद मूल्य वापस करने के साथ मानसिक परेशानी और मुकदमे के खर्च के लिए मुआवजे की मांग की।

कंपनी ने क्या दलील दी?

डीलर और निर्माता ने शिकायत में लगाए गए आरोपों से इनकार किया। कंपनियों का कहना था कि वाहन में कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट नहीं था।

उनकी दलील थी कि वाहन में समस्याएँ पर्याप्त कूलेंट न रखने और डैशबोर्ड पर दिए गए चेतावनी संकेतों का पालन नहीं करने के कारण उत्पन्न हुईं।

निर्माता ने यह भी तर्क दिया कि वाहन का व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा था, इसलिए शिकायतकर्ता को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत उपभोक्ता नहीं माना जाना चाहिए।

इसके जवाब में शिकायतकर्ता ने कहा कि वह स्वयं वाहन चलाकर अपनी आजीविका कमाते हैं।

आयोग ने क्या कहा?

आयोग ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ विशेषज्ञ साक्ष्य पर भी विचार किया। आयोग ने पाया कि खरीद के लगभग दो महीने के भीतर इंजन ओवरहीटिंग, कूलेंट लीकेज और इंजन सीज होने जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आईं और अधिकृत सर्विस सेंटर पर मरम्मत के बावजूद ये समस्याएँ जारी रहीं।

इन तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आयोग ने वाहन में अंतर्निहित मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट होने की शिकायत को स्वीकार किया।

उपभोक्ता की परिभाषा पर आयोग ने कहा कि मुगुंडप्पा वाहन का इस्तेमाल स्वयं अपनी आजीविका कमाने के लिए कर रहे थे। इसलिए केवल वाहन के व्यावसायिक उपयोग के आधार पर उन्हें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।

आयोग का आदेश

शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आयोग ने Arihant Motors और Force Motors को संयुक्त रूप से निम्न निर्देश दिए:

- बस को उसी ब्रांड के नए वाहन से बदला जाए।

- यदि वाहन नहीं बदला जाता है, तो ₹15 लाख की राशि खरीद की तारीख से 6% सालाना ब्याज सहित वापस की जाए।

- मानसिक परेशानी के लिए ₹10,000 का मुआवजा दिया जाए।

- मुकदमे के खर्च के रूप में ₹5,000 का भुगतान किया जाए।

आयोग ने आदेश का अनुपालन 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया।

इस फैसले में आयोग ने यह स्पष्ट किया कि आजीविका कमाने के लिए स्वयं वाहन चलाने वाला व्यक्ति भी उपभोक्ता संरक्षण कानून का लाभ प्राप्त कर सकता है। साथ ही, वारंटी के दौरान बार-बार सामने आने वाली गंभीर तकनीकी समस्याओं और उपलब्ध विशेषज्ञ साक्ष्यों के आधार पर वाहन में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की शिकायत पर राहत दी जा सकती है।

इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए क्लिक करें 

Tags: