नगर पालिका परिषद के लिए गए फ़ैसले के लिए परिषद के अध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Update: 2026-07-08 14:31 GMT

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष और मुख्य नगर पालिका अधिकारी को, परिषद द्वारा विधिवत पारित प्रस्ताव के माध्यम से सामूहिक रूप से लिए गए फ़ैसले के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब पूरी नगर पालिका संस्था ने सर्वसम्मति से फंड के डायवर्जन और अन्य फ़ैसलों को मंज़ूरी दी थी तो केवल दो पदाधिकारियों पर व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद उन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जो राज्य सरकार के एक आदेश से उत्पन्न हुईं। इस आदेश में सरकार ने 'छोटे और मध्यम शहरों के एकीकृत विकास' (IDSMT) योजना के तहत नगर पालिका परिषद, बालोद को दी गई लीज़ रद्द की थी, डायवर्ट की गई लीज़ की रकम की वसूली का निर्देश दिया और तत्कालीन अध्यक्ष व तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया। आवंटन पाने वालों ने अपनी लीज़ रद्द किए जाने को चुनौती दी, जबकि तत्कालीन अध्यक्ष और मुख्य नगर पालिका अधिकारी ने आपराधिक मुक़दमे के निर्देश पर सवाल उठाए।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि प्लॉट की नीलामी करने और उससे मिली आय का इस्तेमाल कर्मचारियों के वेतन, बिजली के बकाया और बुनियादी नागरिक सुविधाओं के भुगतान के लिए करने का फ़ैसला कोई व्यक्तिगत काम नहीं था, बल्कि एक सामूहिक फ़ैसला था। इसलिए पूरी नगर पालिका संस्था द्वारा लिए गए फ़ैसले के लिए उन्हें अकेले ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। राज्य का तर्क था कि नगर पालिका परिषद ने IDSMT योजना के तहत रिहायशी मकान बनाने के बजाय प्लॉट आवंटित करके और आवंटन से मिली आय को लीज़ समझौते के तहत अनुमति न होने वाले कामों में लगाकर लीज़ की शर्तों का उल्लंघन किया।

कोर्ट ने आवंटन रद्द करने के राज्य के फ़ैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि राज्य और नगर पालिका परिषद के बीच हुई लीज़ में साफ़ तौर पर IDSMT योजना के तहत पात्र लाभार्थियों के लिए रिहायशी मकान बनाने की शर्त थी और बिना पूर्व अनुमति के सब-लीज़िंग या अन्य कामों के लिए फंड का डायवर्जन करने पर रोक थी।

कोर्ट ने पाया कि नगर पालिका परिषद ने रिहायशी मकान बनाने के बजाय निजी व्यक्तियों को अविकसित प्लॉट आवंटित किए और उससे मिली रकम का इस्तेमाल लीज़ की शर्तों के विपरीत वेतन, बिजली के बकाया और नागरिक सुविधाओं के लिए किया था। कोर्ट ने आवंटन रद्द करने के फ़ैसले को बरकरार रखा।

तत्कालीन अध्यक्ष और मुख्य नगर पालिका अधिकारी की चुनौती पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब कोई वैधानिक संस्था विचार-विमर्श के बाद सामूहिक रूप से कोई फ़ैसला लेती है तो उसे आम तौर पर किसी एक पदाधिकारी का व्यक्तिगत फ़ैसला नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

“… याचिकाकर्ता… को उस फ़ैसले के लिए अकेले ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जो साफ़ तौर पर एक सामूहिक संस्थागत फ़ैसला था। जब कोई प्रस्ताव पूरी नगरपालिका संस्था का संयुक्त फ़ैसला होता है तो उसके सिर्फ़ दो सदस्यों पर ही व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।”

इसके अनुसार, आवंटन पाने वालों की रिट याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए और आवंटन रद्द करने का फ़ैसला सही ठहराते हुए कोर्ट ने तत्कालीन अध्यक्ष और तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी की रिट याचिकाओं को आंशिक रूप से मंज़ूरी दी और वह आदेश रद्द किया, जिसमें उनके ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया।

केस का शीर्षक: राकेश यादव बनाम भारत संघ और अन्य [WPC नंबर 489 ऑफ़ 2018] और इससे जुड़े मामले।

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