RTI Act | धारा 5 की शर्तें पूरी किए बिना 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' को 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' नहीं माना जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' (प्रथम अपीलीय प्राधिकारी) को धारा 5(4) और 5(5) में बताई गई कानूनी शर्तों को पूरा किए बिना 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' (मानित जन सूचना अधिकारी) नहीं माना जा सकता और न ही उन पर अधिनियम की धारा 20(1) के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है। कोर्ट ने पाया कि राज्य सूचना आयोग ने ज़रूरी निष्कर्ष दर्ज किए बिना ही जुर्माना लगा दिया था। [2026 LiveLaw (Chh) 75]
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें RTI Act की धारा 20(1) के तहत 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्होंने नोटिस जारी करके, सुनवाई का मौका देकर और तर्कपूर्ण आदेश के साथ पहली अपील का निपटारा करके 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' के तौर पर अपने कर्तव्यों का पालन किया। उन्होंने यह भी कहा कि मांगी गई जानकारी किसी दूसरे कार्यालय से संबंधित थी और राज्य सूचना आयोग ने उन्हें गलत तरीके से 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' माना, जबकि असली 'पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' को बरी कर दिया।
कोर्ट ने देखा कि मुख्य सवाल यह था कि क्या 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' को 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' माना जा सकता है और अधिनियम की धारा 20(1) के तहत उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि धारा 5(4) और 5(5) के तहत, किसी अधिकारी को 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' तभी माना जा सकता है जब नियुक्त 'पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' ने उनसे मदद मांगी हो।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि ऐसी कोई मदद मांगी गई थी या याचिकाकर्ता को जानकारी देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' के तौर पर काम करने से धारा 5(5) के तहत 'डीमिंग फिक्शन' (कानूनी तौर पर मान लेने का नियम) लागू नहीं होता है।
कोर्ट ने कहा,
"...ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि कभी ऐसी मदद मांगी गई थी या याचिकाकर्ता को जानकारी देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। सिर्फ़ 'फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी' के तौर पर काम करने से धारा 5(5) के तहत 'डीमिंग फिक्शन' लागू नहीं होता है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि तय किए गए पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया, जबकि याचिकाकर्ता पर बिना किसी कानूनी रूप से सही कारण के पूरा जुर्माना लगा दिया गया। कोर्ट ने यह भी पाया कि जिस आदेश को चुनौती दी गई थी, उसमें सेक्शन 20(1) के तहत ज़रूरी कानूनी शर्तों के बारे में कोई संतुष्टि दर्ज नहीं की गई।
कोर्ट ने फिर से कहा कि RTI Act की धारा 20 के तहत जुर्माना दंडात्मक प्रकृति का होता है, इसलिए कानूनी शर्तों को सख्ती से पूरा किया जाना चाहिए और नोटिस पाने वाले के स्पष्टीकरण को खारिज करते समय कारण दर्ज किए जाने चाहिए। कोर्ट ने माना कि स्टेट इन्फॉर्मेशन कमीशन ने एक्ट की ज़रूरी शर्तों को पूरा किए बिना याचिकाकर्ता को 'डीम्ड पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर' मानकर गलती की थी। साथ ही, जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसमें दिमाग का इस्तेमाल न करने, कानूनी प्रावधानों की गलत व्याख्या और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन जैसी कमियां थीं।
इसके अनुसार, कोर्ट ने रिट याचिका को मंज़ूरी दी, RTI Act की धारा 20(1) के तहत 25,000 रुपये का जुर्माना लगाने वाला 21.09.2021 का आदेश रद्द किया और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही, जिसमें रिकवरी की कार्यवाही भी शामिल है (यदि कोई हो), उसे भी रद्द कर दिया।
Case Title: Kaushlendra Kumar v. State of Chhattisgarh & Ors. [WPC No. 1745 of 2022]