जब तक जाति-आधारित अपमान के इरादे से पीड़ित की जाति का उल्लेख न किया गया हो, एससी/एसटी एक्‍ट के तहत अपराध नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

Update: 2023-01-30 07:24 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक फैसले में माना कि अपमान या जातिवादी टिप्पणी के किसी इरादे के बिना केवल गालियां देना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं है।

ज‌स्टिस एम नागप्रसन्ना की सिंगल जज बेंच ने शैलेश कुमार वी की ओर से दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया, और अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और (एस) के तहत लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया। हालांकि भारतीय दंड संहिता के तहत आरोपों के लिए कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।

कोर्ट ने कहा,

"केवल पीड़ित की जाति का नाम लेना अपराध नहीं है, जब तक कि यह संबंधित व्यक्ति के अपमान के इरादे से न हो।"

मामले में जयम्मा नामक एक महिला ने 14-06-2020 को शिकायत दर्ज कराई कि उसके बेटे और याचिकाकर्ता ने अपने दोस्तों के साथ एक क्रिकेट मैच खेला था, जिसमें उसके बेटे की टीम हार गई। जिसके कारण याचिकाकर्ता और उसके बेटे के बीच कुछ विवाद हुआ था, जिसके बाद उसके बेटे से मारपीट की गई थी। इसके बाद पुलिस ने याचिकाकर्ता और पुनीत नामक एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की।

जांच में पता चला कि शिकायतकर्ता के बेटे के खिलाफ याचिकाकर्ता और अन्य लोगों ने "गंदी भाषा" में कुछ अपशब्द कहे थे, जिसके बाद अधिनियम के तहत दंडनीय अपराधों को जोड़ा गया था

सत्र न्यायाधीश ने 01-03-2021 के आदेश के जरिए चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 147, 323, 324, 365, 504, 506 सहप‌ठित धारा 149 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम धारा 3(1)(आर) और (एस) के तहत दर्ज अपराधों का संज्ञान ‌लिया ‌था। हाईकोर्ट में संज्ञान को चुनौती दी गई थी।

पीठ ने कहा कि घटना के तुरंत बाद की प्रारंभिक शिकायत में, ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई थी कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के बेटे की जाति का नाम लेकर गालियां दी थीं। आरोप केवल गंदी भाषा का उपयोग कर रहा था और शिकायतकर्ता के बेटे को धमकी दे रहा था।

अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और (एस) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि प्रावधान की आत्मा इरादा है। अपमान जानबूझकर किया जाना चाहिए और धमकी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपमानित करने के इरादे से होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

“चार्जशीट या बयान किसी अन्य परिस्थिति का वर्णन नहीं करते हैं, सिवाय इसके कि शिकायतकर्ता के गालियों में बेटे की जाति का नाम इस्तेमाल किया गया था। बयानों में या चार्जशीट के सार में जाति का नाम लेकर अपमान करने या अपमानित करने के इरादे का कोई वर्णन नहीं है।"

यह देखते हुए कि केवल पीड़ित की जाति का नाम लेने से यह अपराध नहीं होगा, जब तक कि उक्त जाति से संबंधित व्यक्ति का अपमान करने का इरादा न हो, अदालत ने कहा, "मामले में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित होने के कारण, अधिनियम के तहत अपराधों को जारी रखने के लिए आगे की कार्यवाही की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।"

कोर्ट ने कहा,

"जहां तक अन्य अपराधों का संबंध है, आईपीसी की धारा 323, 324, 365, 504 और 506 के तहत दंडनीय अपराधों के संबंध में शिकायत से चार्जशीट तक निस्संदेह सामग्री मौजूदा है, जिन पर मुकदमा चलाया जाना है। यह याचिकाकर्ता पर है कि वह आईपीसी के तहत अपराधों में पाक-साफ निकले। चूंकि अपराध प्रकृति में गंभीर हैं, इसलिए जहां तक आईपीसी के तहत अपराधों का संबंध है, इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।”

केस टाइटल: शैलेश कुमार वी और कर्नाटक राज्य

केस नंबर : क्रिमिनल पेटिशन नंबर 2797 ऑफ 2022

साइटेशन: 2023 लाइवलॉ (कर) 31

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