दिल्ली कोर्ट ने कहा कि सरकार से, और खासकर जन-प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे व्यक्ति से सवाल पूछना मानहानि नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि लोकतंत्र में नेताओं को आलोचना का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

राउज़ एवेन्यू कोर्ट की एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) नेहा मित्तल ने कहा,

"किसी दूसरे व्यक्ति से, खासकर संसद में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे व्यक्ति से कानून-व्यवस्था की स्थिति या किसी अन्य मामले के बारे में सवाल पूछना मानहानि नहीं माना जा सकता।"

अदालत ने यह टिप्पणी आम आदमी पार्टी (AAP) नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ दिल्ली के मंत्री प्रवेश साहिब सिंह द्वारा दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए की।

यह शिकायत भारद्वाज के उन सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो को लेकर दायर की गई, जिनमें एसएस मोटा सिंह स्कूल ट्रस्ट के ट्रस्टी की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं और इससे जुड़े POCSO मामले को सरकार द्वारा संभालने के तरीके पर सवाल उठाए गए।

जज ने कहा कि जन-प्रतिनिधियों से सवाल पूछने के काम को मानहानि मानना ​​"लोकतंत्र के दौर में एक काला अध्याय" होगा।

अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रेस और जनता को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है और चुने हुए प्रतिनिधियों को अलग-अलग राय सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।

यह शिकायत मई में भारद्वाज द्वारा पब्लिश किए गए सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो से जुड़ी थी, जिनमें उन्होंने स्कूल ट्रस्ट के ट्रस्टी के तौर पर अमरजीत सिंह बाबू की कथित नियुक्ति, ट्रस्ट की कथित तौर पर गायब फाइल और तीन साल की बच्ची से जुड़े POCSO मामले पर सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठाए।

अदालत ने पाया कि पोस्ट को समग्र रूप से पढ़ने पर पता चलता है कि उनमें शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानिपूर्ण आरोप लगाने के बजाय सरकार के कामकाज की आलोचना की गई।

अदालत ने कहा कि कोई भी समझदार व्यक्ति इन पोस्ट को पढ़ने पर यही समझेगा कि इनमें सरकार के कथित लापरवाह रवैये पर सवाल उठाए गए।

अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि राजनीतिक हस्तियों और पार्टियों से जुड़ी सार्वजनिक चर्चा में आपराधिक मानहानि का पैमाना ऊंचा होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि विपक्षी पार्टी AAP के आधिकारिक प्रवक्ता के तौर पर भारद्वाज की यह सार्वजनिक ज़िम्मेदारी थी कि वे सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करें, कमियां बताएं, सरकार के कामों की आलोचना करें और नीतियों की जांच-परख करें।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की जांच-परख सत्ता के दुरुपयोग और तानाशाही रवैये के खिलाफ एक प्रहरी (वॉचडॉग) का काम करती है।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि जिन पोस्ट का ज़िक्र किया गया, उनमें दी गई जानकारी पहले से ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी, और मानहानि की शिकायत पर आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले।

कोर्ट ने यह भी पाया कि वर्मा "गलत नीयत" (Unclean Hands) के साथ कोर्ट आए; सोशल मीडिया पोस्ट से पता चला कि वे बाबू को कॉलेज के दिनों से जानते थे, जो उनके इस दावे से मेल नहीं खाता था कि उनका बाबू से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं था।

कोर्ट ने कहा,

"जो मुक़दमेबाज़ न्याय की प्रक्रिया को दूषित करने की कोशिश करता है या जो न्याय की पवित्र नींव को दागदार हाथों से छूता है, वह किसी भी राहत का हकदार नहीं है। किसी भी मुक़दमेबाज़ को बेबुनियाद याचिका दायर करके न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।"

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