जांच अधिकारी ऐसे कृत्य में लिप्त ना हो, जिससे आरोपी को फायदा होः बॉम्‍बे हाईकोर्ट

Update: 2021-03-26 06:54 GMT

एक मोटर दुर्घटना, जिसमें कथ‌ित रूप से एक सब-इंस्पेक्टर के शामिल होने का आरोप था, में मारी गए एक महिला के पिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए, बॉम्‍बे हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर कि कैसे जांच अधिकारियों को ऐसे अपराधों की जांच करनी चाहिए, कुछ महत्वपूर्ण टिप्पण‌ियां की।

जस्टिस रविंद्र वी घुगे और जस्टिस बीयू देबद्वार की खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि एक जांच अधिकारी अपराध प्रक्रिया संहिता/ उसकी सर्वोत्तम क्षमता के लिए लागू प्रक्रिया के अनुसार अपराध की जांच करे। ।

कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को ऐसी खामियां नहीं छोड़ना है, जिससे आरोपियों को फायदा हो।

"हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि एक जांच अधिकारी को अपराध प्रक्रिया संहिता/ लागू प्रक्रिया और उसकी क्षमता के अनुसार अपराध की जांच करना होता है। उसे जांच के दरमियान ऐसी किसी भी गतिविधि में लिप्त नहीं होना चाहिए, जिससे ऐसा लगे कि जांच अधिकारी ने जानबूझकर खामियां छोड़ी हैं, ताकि आरोपी को फायदा हो सके।"

मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी बेटी को पुलिस के उप-निरीक्षक ने जानबूझकर मारा दिया और जांच अधिकारियों ने मामले को छुपाने की कोशिश की।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश जांच के उदाहरणों की ओर इशारा करते हुए, अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने गंभीरता से अपराध की जांच नहीं की। न्यायालय ने उल्लेख किया कि दुर्घटना का करण रही कार को जब्त करने का पंचनामा पुलिस ने तैयार नहीं किया, यह लापरवाही का एक ठोस उदाहरण है।

कोर्ट ने इस दलील को खारिज़ कर दिया कि जांच अधिकारी ने अनजाने में खामियों को छोड़ दिया।

"विद्वान सरकारी वकील ने यह स्वीकार किया है कि ऐसी गलतियां अनजाने में हुई हैं। हम इस प्रकार की दलील को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि एक अनुभवी जांच अधिकारी कभी अनजाने में ऐसी हरकत नहीं करेगा।"

अदालत ने याचिकाकर्ता के इस बयान को भी दर्ज किया कि जांच अधिकारी ने अभियुक्त को बचाया और वे दोनों एक ही पुलिस थाने में तैनात थे।

इस संबंध में, अदालत ने कहा कि आरोपी पुलिस अधिकारी का, दोष का पता चलते ही तबादला कर दिया जाना चाहिए था। इसके बजाय, वह रिश्वत के एक अन्य मामले में फंसने तक कार्यालय में बने रहे।

मामले में पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने और जांच की एक उचित जांच कराने का आदेश देते हुए, न्यायालय ने कहा कि वह बिना किसी भय या पक्षपात के कार्य करें।

कोर्ट ने कहा, लोक अभियोजक का यह दलील कि जांच अधिकारी की एक साल के लिए वेतन वृद्धि रोक दी जाएगी, बेंच को स्वीकार नहीं है। यह कहते हुए कि यह एक धोखा है, अदालत ने कहा कि जांच अध‌िकारी को विभागीय जांच के लिए कारण बताओ नोटिस और आरोप पत्र दिया जाए।

कोर्ट ने कहा कि दोषी पाए जाने पर अधिकारी को अधिकतम संभव सजा दिया जाए और मामले को निस्तारित कर दिया।

याचिकाकर्ता की अन्य प्रार्थना कि जांच को एक अन्य जांच एजेंसी को हस्तांतरित किया जाए, को ट्रायल कोर्ट के विचार के लिए छोड़ दिया गया।

याचिकाकर्ता के मामले में वकील सईद एस शेख ने बहस की। लोक अभियोजक डीआर काले और केएस पाटिल राज्य की ओर से पेश हुए।

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