संभल हिंसा मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR का आदेश देने वाले जज का हुआ ट्रांसफर

Update: 2026-01-21 04:09 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को प्रशासनिक आदेश जारी कर 14 न्यायिक अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया, जिसमें संभल के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर भी शामिल हैं। उन्हें सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर ट्रांसफर किया गया।

यह ट्रांसफर CJM सुधीर के उस आदेश के कुछ ही दिनों बाद हुआ, जिसमें उन्होंने नवंबर, 2024 की संभल हिंसा के सिलसिले में पूर्व सर्कल ऑफिसर (CO) अनुज चौधरी समेत कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया था।

नवंबर, 2024 की संभल हिंसा के सिलसिले में संभल सर्कल ऑफिसर अनुज चौधरी, संभल कोतवाली इंचार्ज अनुज कुमार तोमर और 15-20 अज्ञात पुलिसकर्मी शामिल हैं।

पुलिस अधिकारियों पर जान से मारने की नीयत से गोली चलाने का आरोप था, जिसमें आलम नाम का एक स्थानीय युवक गंभीर रूप से घायल हो गया।

CJM विभांशु सुधीर ने घायल युवक के पिता यामीन द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत दायर आवेदन को स्वीकार कर लिया।

आवेदन में आरोप लगाया गया कि 24 नवंबर, 2024 को सुबह करीब 8:45 बजे, आवेदक का बेटा संभल के मोहल्ला कोट स्थित जामा मस्जिद के पास अपनी ठेले पर 'पापे' (रस्क) और बिस्किट बेच रहा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि नामजद पुलिस अधिकारियों ने अचानक जान से मारने की नीयत से भीड़ पर अपनी बंदूकों से फायरिंग शुरू की।

कोर्ट की टिप्पणियां

पुलिस रिपोर्ट और मेडिकल रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि यह साफ है कि पीड़ित को गोलियां लगी थीं, लेकिन गोली चलाने वाले की पहचान अभी भी जांच का विषय है।

कोर्ट ने कहा कि घटना की असली सच्चाई सिर्फ पीड़ित ही बता सकता है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि "हत्या का प्रयास" एक बहुत गंभीर अपराध है, इसलिए यह संभावना नहीं है कि कोई पीड़ित असली अपराधी को छोड़कर किसी और पर गलत आरोप लगाएगा।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"ऐसी स्थिति में यह साफ है कि अगर किसी के खिलाफ हत्या के प्रयास जैसा जघन्य अपराध किया जाता है तो पीड़ित उसी व्यक्ति पर आरोप लगाएगा जिसने अपराध करने की कोशिश की।" अपने 11 पेज के ऑर्डर में CJM सुधीर ने यह भी कहा था कि पुलिस आपराधिक कामों के लिए "ऑफिशियल ड्यूटी" की आड़ नहीं ले सकती। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए CJM ने कहा कि किसी व्यक्ति पर गोली चलाना ऑफिशियल ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

इसलिए कोर्ट ने गोली के बोर के बारे में पुलिस के शुरुआती बचाव खारिज कर दिया, क्योंकि उसने पाया कि पुलिस रिपोर्ट 'संदिग्ध' थी और मेडिकल सबूतों से अलग थी, जिसमें साफ तौर पर "गोली लगने का घाव" और "दंगे में पुलिस फायरिंग" लिखा था।

यह पाते हुए कि पहली नज़र में एक संज्ञेय अपराध हुआ है, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि सच्चाई का पता केवल सही जांच से ही लगाया जा सकता है।

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