CJI सूर्यकांत ने भूटान की न्याय व्यवस्था में टेक्नोलॉजी आधारित सुधारों का दिया सुझाव
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने भूटान में न्याय तक पहुंच को आसान बनाने के लिए तकनीक आधारित सुधारों का प्रस्ताव दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि “जस्टिस कियोस्क”, सरल डिजिटल फाइलिंग सिस्टम और टेली-लॉ सेवाओं के माध्यम से अदालतों को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाया जा सकता है।
भूटान की राजधानी थिम्फू स्थित रॉयल यूनिवर्सिटी ऑफ भूटान में “Wisdom for the Future – JSW Talk Series” के तहत “21वीं सदी में न्याय तक पहुंच: तकनीक, कानूनी सहायता और जन-केंद्रित अदालतें” विषय पर व्याख्यान देते हुए CJI ने कहा कि तकनीक का उद्देश्य केवल अदालतों की प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक और आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “जन-केंद्रित अदालत वह है जहाँ कानून की जटिलता को तकनीक की मदद से सरल बनाया जाए, ताकि अदालत की गरिमा लोगों के हाथों की हथेली तक पहुँच सके।”
भारत में न्यायपालिका के डिजिटलीकरण के अनुभव का उल्लेख करते हुए CJI सूर्यकांत ने भूटान में “जस्टिस कियोस्क” मॉडल अपनाने का सुझाव दिया। इसके तहत स्थानीय प्रशासनिक केंद्रों में छोटे डिजिटल केंद्र बनाए जा सकते हैं, जिनमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और दस्तावेज स्कैनिंग जैसी सुविधाएं हों। इससे दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग बिना लंबी यात्रा किए अदालत की कार्यवाही में शामिल हो सकेंगे।
उन्होंने कहा, “जब हम अदालत को समुदाय तक ले आते हैं, तो न्याय पाने के लिए दूरी बाधा नहीं रह जाती।”
CJI ने यह भी सुझाव दिया कि भूटान में जोंगखा और अंग्रेजी भाषा में सरल डिजिटल फाइलिंग सिस्टम विकसित किए जाएं, ताकि आम लोग मोबाइल ऐप जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे दावों या भूमि विवाद से जुड़े मामलों की शुरुआत कर सकें। इससे लोगों को जटिल कानूनी प्रक्रियाओं से डर नहीं लगेगा।
उन्होंने तकनीक आधारित कानूनी सहायता सेवाओं को बढ़ाने पर भी जोर दिया। CJI ने सुझाव दिया कि भूटान के क्षेत्रीय लीगल एड केंद्रों को टेली-लॉ प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए, जिससे लोग वीडियो या ऑनलाइन माध्यम से वकीलों से सलाह ले सकें और विवाद लंबी मुकदमेबाजी में बदलने से पहले ही हल हो सकें।
भारत के अनुभव का जिक्र करते हुए CJI ने कहा कि न्यायपालिका के लिए तकनीक “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करती है। भारत में ई-फाइलिंग सिस्टम, डिजिटल कॉज लिस्ट, वर्चुअल सुनवाई और ऑनलाइन विवाद समाधान जैसी कई डिजिटल पहलें शुरू की गई हैं।
उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान हुई वर्चुअल सुनवाई से यह साबित हुआ कि अदालत की कार्यवाही बिना भौतिक अदालतों के भी प्रभावी ढंग से जारी रह सकती है।
हालांकि, उन्होंने चेतावनी भी दी कि तकनीक लागू करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि इससे नई तरह की असमानता पैदा न हो। यदि किसी नागरिक को इंटरनेट या भाषा की समझ नहीं है, तो डिजिटल व्यवस्था भी उसके लिए बाधा बन सकती है।
इस समस्या को दूर करने के लिए भारतीय न्यायपालिका ने “SUVAS” (Supreme Court Vidhik Anuvaad Software) जैसे अनुवाद उपकरण विकसित किए हैं, जो फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करने में मदद करते हैं।
CJI ने कानून की पढ़ाई में तकनीक को शामिल करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों और न्यायिक अकादमियों में लीगल इन्फॉर्मेटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नैतिकता, डेटा साइंस, कम्प्यूटेशनल लॉ और डिजाइन थिंकिंग जैसे विषय पढ़ाए जाने चाहिए।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि भारत का सुप्रीम कोर्ट भूटान के कानून छात्रों के लिए इंटर्नशिप और एक्सचेंज प्रोग्राम आयोजित करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण कोई भी छात्र इन अवसरों से वंचित न रहे, इसके लिए रहने और भोजन की व्यवस्था में भी मदद की जा सकती है।
अपने संबोधन के दौरान CJI ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी सुधारों का अंतिम उद्देश्य “जन-केंद्रित अदालतें” बनाना होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “न्याय को नागरिक तक पहुंचना चाहिए, न कि नागरिक को न्याय के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़े।”
अंत में CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका में तकनीकी सुधार तभी सफल होंगे जब न्यायाधीशों, विधायकों, वकीलों और छात्रों के बीच सहयोग हो। उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य न्याय, पारदर्शिता और मानव गरिमा को मजबूत करना होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “न्याय अदालत के भारी दरवाजों के पीछे बंद कोई गुण नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत उपस्थिति है, जिसे लोगों के घरों और जीवन तक पहुंचना चाहिए।”