भविष्य का जज केवल कानून का विशेषज्ञ नहीं होगा, उसे विज्ञान-तकनीक की समझ भी जरूरी: सीजेआई सूर्यकांत
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि भविष्य का जज केवल कानून और नज़ीरों (precedents) तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसे विज्ञान, तकनीक, नैतिकता और समाज जैसे विभिन्न क्षेत्रों की गहरी समझ भी विकसित करनी होगी।
सीजेआई सूर्यकांत 'Reimagining Justice: The Indian Judiciary 50 Years Hence' विषय पर आयोजित चौथे अशोक देसाई मेमोरियल लेक्चर को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम में लेखक और इतिहासकार Manu S. Pillai (मनु एस. पिल्लई) भी मौजूद थे।
जज की भूमिका में होगा बड़ा बदलाव
सीजेआई ने कहा कि आने वाले समय में न्यायाधीशों को जटिल और बहु-विषयक (interdisciplinary) मामलों से निपटना होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सिंथेटिक बायोलॉजी (synthetic biology) जैसे क्षेत्रों में ऐसे विवाद सामने आ सकते हैं, जहां “जीवन” को ही इंजीनियर किया जाएगा और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों का निर्धारण करना होगा।
इसी तरह डीप-सी माइनिंग (deep-sea mining) जैसे विषय पर्यावरणीय जिम्मेदारी और अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) की पारंपरिक सीमाओं को चुनौती देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में वर्चुअल समुदायों से जुड़े विवाद भी अदालतों के सामने आ सकते हैं, जो भौतिक दुनिया से परे डिजिटल अस्तित्व पर आधारित होंगे।
2076 का जज होगा बहु-विषयक सोच वाला
सीजेआई सूर्यकांत के अनुसार, वर्ष 2076 का जज एक ऐसा व्यक्ति होगा, जो विज्ञान, तकनीक, नैतिकता और समाज को समान रूप से समझने और संतुलित करने में सक्षम होगा।
उन्होंने कहा कि अदालतों को जलवायु परिवर्तन से जुड़े मामलों और नदियों, जंगलों व पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystems) जैसे प्राकृतिक तत्वों के अधिकारों को भी मान्यता देनी पड़ सकती है।
उन्होंने “इकोसाइड” (ecocide) की अवधारणा का भी उल्लेख किया, जो भविष्य में आपराधिक कानून का हिस्सा बन सकती है, जहां पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाने वाले कृत्य अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं।
आपराधिक कानून और अन्य कानूनों में बदलाव
सीजेआई ने कहा कि भविष्य में आपराधिक कानून की परिभाषाएं भी बदलेंगी, क्योंकि कई नए प्रकार के अपराध पारंपरिक श्रेणियों में फिट नहीं बैठेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि Carriage of Goods Act जैसे कानून, जो आज कम महत्व के लगते हैं, भविष्य में अधिक प्रासंगिक हो सकते हैं—खासकर तब, जब ड्रोन और स्वचालित वाहनों के जरिए सामान का परिवहन होगा।
न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका
सीजेआई ने Artificial Intelligence (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की भूमिका पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि AI न्यायिक निर्णयों का स्थान नहीं लेगा, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण सहायक (enabler) की भूमिका निभाएगा।
AI की मदद से जज बड़ी मात्रा में डेटा और नज़ीरों का तेजी से विश्लेषण कर सकेंगे, जिससे वे अधिक निष्पक्ष और प्रभावी निर्णय देने पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।
उन्होंने कहा कि इससे न्याय तक पहुंच (access to justice) भी बेहतर होगी और अदालतें आम लोगों के और करीब आएंगी।
अदालतों का स्वरूप भी बदलेगा
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आने वाले वर्षों में अदालतों का स्वरूप भी काफी बदल सकता है। संभव है कि कोर्टरूम में तकनीक की बड़ी भूमिका हो, जहां मामलों की पुकार, कार्यवाही का रिकॉर्ड और वकीलों की दलीलें स्वतः प्रदर्शित हों।
उन्होंने यह भी संभावना जताई कि भविष्य में अदालतों में भौतिक उपस्थिति कम हो सकती है और अधिकांश कार्यवाही वर्चुअल प्लेटफॉर्म के माध्यम से हो सकती है।
निष्कर्ष
सीजेआई सूर्यकांत ने निष्कर्ष में कहा कि वर्ष 2076 की भारतीय न्यायपालिका भले ही तकनीकी और संरचनात्मक रूप से बदल जाए, लेकिन वह संविधान के मूल्यों पर आधारित रहेगी और तेजी से बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को ढालती रहेगी।