सरकारी कर्मचारी की हत्या के आरोपी परिजन को मिलने वाली 'दया के आधार पर आर्थिक सहायता' पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया नियम
सुप्रीम कोर्ट ने 'हरियाणा सिविल सेवा (दया के आधार पर आर्थिक सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019' के नियम 23(1) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। यह नियम मृतक सरकारी कर्मचारी के परिवार को मिलने वाली दया के आधार पर आर्थिक सहायता को तब रोक देता है, जब परिवार का कोई पात्र सदस्य कर्मचारी की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोपी हो। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान दया के आधार पर नियुक्ति के दावों पर लागू नहीं होता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला अतुल चौहान की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। अतुल चौहान का दया के आधार पर नियुक्ति का दावा उनकी मां के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही के कारण रोक दिया गया; उनकी मां पर हरियाणा में सरकारी स्कूल शिक्षक रहे उनके पति (अतुल के पिता) की हत्या की साजिश रचने का आरोप था।
कोर्ट ने माना कि नियम 23(1) संवैधानिक रूप से वैध है, क्योंकि इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को दया के आधार पर आर्थिक सहायता मिलने से रोकना है, जो उस मौत के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार हो सकता है, जिसके कारण यह दावा किया गया। इस प्रावधान को दंडात्मक के बजाय "निवारक और नियामक" बताया गया और पाया गया कि इसका अपने उद्देश्य के साथ तार्किक संबंध है, जिससे यह संविधान के अनुच्छेद 14 की आवश्यकताओं को पूरा करता है।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि यह केवल आपराधिक कार्यवाही पूरी होने तक दया के आधार पर आर्थिक सहायता पाने को टालता है। साथ ही यह उस व्यक्ति को कर्मचारी की मौत से मिलने वाले लाभों को प्राप्त करने से रोकने का उचित उद्देश्य पूरा करता है, जो उस मौत के लिए जिम्मेदार हो सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"किसी कानूनी रियायत को आपराधिक कार्यवाही की अवधि तक अस्थायी रूप से और किसी खास उद्देश्य के लिए रोकना भेदभावपूर्ण नहीं है और न ही यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।"
साथ ही बेंच ने फैसला सुनाया कि राज्य के अधिकारियों और पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने दया के आधार पर नियुक्ति के दावे पर नियम 23(1) को लागू करने में गलती की। जजों ने गौर किया कि 2019 के नियमों में "दया के आधार पर आर्थिक सहायता" और "दया के आधार पर नियुक्ति" के बीच स्पष्ट अंतर रखा गया है; दोनों तरह की राहत के लिए अलग-अलग परिभाषाएं, पात्रता मानदंड, प्रक्रियाएं और सक्षम अधिकारी तय किए गए। कोर्ट ने कहा कि चूंकि नियम 23(1) में साफ़ तौर पर सिर्फ़ सहानुभूति के आधार पर मिलने वाली आर्थिक मदद का ज़िक्र है, इसलिए इसकी व्याख्या करके इसे सहानुभूति के आधार पर नौकरी देने तक नहीं बढ़ाया जा सकता।
कोर्ट ने अतुल चौहान की अपील मंज़ूर की और हरियाणा के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सहानुभूति के आधार पर नौकरी के लिए उनके दावे पर तीन महीने के भीतर विचार करें।
मामले की पृष्ठभूमि
हरियाणा में जूनियर बेसिक टीचर रहे चौहान के पिता गजेंद्र सिंह चौहान की सितंबर 2021 में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी, जिसे बाद में हत्या का मामला माना गया। चौहान की माँ पर हत्या की साज़िश रचने का आरोप लगाया गया। आपराधिक कार्यवाही चलने के दौरान, अधिकारियों ने परिवार के सहानुभूति-आधारित लाभों के दावे को रोक कर रखा था। हालांकि, माँ को अक्टूबर 2024 में संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया, लेकिन उनके बरी होने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में अपील लंबित है।
2019 के नियमों के नियम 23(1) का हवाला देते हुए एलिमेंट्री एजुकेशन के डायरेक्टर ने सहानुभूति के आधार पर नौकरी के लिए चौहान के अनुरोध पर विचार टाल दिया था। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उस फ़ैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने यह भी माना था कि सहानुभूति-आधारित लाभों का दावा करने का पहला अधिकार विधवा का है और बेटे का दावा तभी बन सकता है, जब माँ का दावा अंतिम रूप से तय हो जाए।
हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम 23(1) सिर्फ़ सहानुभूति के आधार पर मिलने वाली आर्थिक मदद पर लागू होता है, न कि सहानुभूति के आधार पर नौकरी देने पर।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की राय से असहमति जताई
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि दया के आधार पर नियुक्ति (compassionate appointment) कोई पक्का या वंशानुगत अधिकार नहीं है और यह लागू योजना के तहत तय पात्रता शर्तों के अधीन है। हालाँकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यही सिद्धांत राज्य को ऐसे आधारों पर दावा खारिज करने या टालने से भी रोकता है, जो लागू नियमों में शामिल नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा,
“राज्य दया के आधार पर नियुक्ति के दावे को ऐसे प्रावधान का हवाला देकर खारिज या टाल नहीं सकता जो, नियमों को सही ढंग से पढ़ने पर केवल किसी अन्य प्रकार की राहत पर लागू होता है। दावेदार से की जाने वाली सख्त अपेक्षा के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि अधिकारी केवल उन्हीं शक्तियों का इस्तेमाल करे, जो नियम उसे देते हैं। दया के आधार पर नियुक्ति के पीछे के मानवीय मकसद को देखते हुए यह बात और भी अहम हो जाती है। कोर्ट ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि दया के आधार पर नियुक्ति का मकसद मृतक कर्मचारी के शोक संतप्त परिवार को तुरंत राहत देना और अचानक आई आर्थिक तंगी को कम करना है।”
कोर्ट ने गौर किया कि नियम 23 का शीर्षक खास तौर पर "आपराधिक कार्यवाही के मामले में दया के आधार पर आर्थिक सहायता के नियमन" का ज़िक्र करता है और इस प्रावधान में बार-बार "दया के आधार पर आर्थिक सहायता" शब्द का इस्तेमाल किया गया है, न कि दया के आधार पर नियुक्ति का।
राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए कि नियम की व्याख्या मकसद को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए ताकि दोनों तरह की राहत इसमें शामिल हो सकें, कोर्ट ने कहा,
“नियम 23(1) की भाषा स्पष्ट है। इसका केवल एक ही अर्थ निकलता है। इस प्रावधान में 'दया के आधार पर आर्थिक सहायता' शब्द का इस्तेमाल किया गया, और पूरे प्रावधान में केवल इसी शब्द का इस्तेमाल हुआ।”
इसने आगे कहा,
“मकसद को ध्यान में रखकर की जाने वाली व्याख्या असल अस्पष्टता को दूर करने का एक तरीका है; यह स्पष्ट लिखे हुए नियम को दरकिनार करने या ऐसे प्रावधान जोड़ने का लाइसेंस नहीं है, जिन्हें विधायिका/राज्य ने ज़रूरी नहीं समझा। यहां लिखा हुआ नियम स्पष्ट और खास है, और हम इसे लागू करने के लिए बाध्य हैं।”
इसने आगे कहा कि प्रावधान में दया के आधार पर नियुक्ति को शामिल करना “कानूनी व्याख्या का काम नहीं होगा; यह न्यायिक कानून बनाने जैसा होगा।”
कोर्ट ने गौर किया कि 2019 के नियमों में दया के आधार पर आर्थिक सहायता और दया के आधार पर नियुक्ति के बीच स्पष्ट अंतर रखा गया। इन्हें अलग-अलग परिभाषित किया गया, अलग-अलग प्रक्रियाओं से नियंत्रित किया जाता है और अलग-अलग अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि इस कानूनी ढांचे से पता चलता है कि नियम 23 से दया के आधार पर नियुक्ति को जानबूझकर हटाया गया। कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस बात से भी असहमति जताई कि बेटे के दावे पर विचार करने से पहले विधवा के दावे पर फ़ैसला होना ज़रूरी है।
नियमों की रूपरेखा को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि नियम 5(1)(f) के तहत सहानुभूति के आधार पर आर्थिक मदद के लिए "परिवार" की परिभाषा में "failing" (यानी 'न होने पर') शब्द के बार-बार इस्तेमाल से एक क्रम (hierarchy) बनता है। इसका मतलब है कि निचले क्रम के दावेदारों पर तभी विचार किया जा सकता है जब ऊँचे क्रम के दावेदार उपलब्ध न हों। हालाँकि, नियम 5(1)(g) के तहत सहानुभूति के आधार पर नौकरी के लिए "परिवार" की परिभाषा में ऐसी कोई बात नहीं कही गई।
कोर्ट ने कहा कि नियम 5(1)(g) सिर्फ़ परिवार के योग्य सदस्यों की पहचान करता है और विधवा के पक्ष में कोई पक्का क्रम-संबंधी प्रतिबंध (absolute sequential bar) नहीं बनाता।
कोर्ट ने कहा,
"नियम 5(1)(g) में 'failing' (यानी एक के बाद दूसरे पर विचार करने) वाली बात न होने का मतलब है कि नियम 5(1)(g) यह बताता है कि सहानुभूति के आधार पर नौकरी (compassionate appointment) के लिए 'परिवार' में कौन-कौन शामिल है; इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक कैटेगरी पर विचार करने के लिए दूसरी कैटेगरी को छोड़ना होगा या उससे ऊपर लिस्ट में शामिल लोगों के दावे के फेल होने पर ही अगली कैटेगरी पर विचार किया जाएगा।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि अपील करने वाले की माँ और भाई ने हलफ़नामा देकर अपील करने वाले के पक्ष में अपने दावे छोड़ दिए, लेकिन न तो अधिकारियों और न ही हाईकोर्ट ने उन हलफ़नामों पर ठीक से ध्यान दिया।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नियम 23(1) की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सहानुभूति के आधार पर आर्थिक मदद से जुड़ा नियम 23(1) इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि यह मामला सहानुभूति के आधार पर नौकरी से जुड़ा है।
अपील करने वाले के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने 2019 के नियमों में एक विसंगति (anomaly) की ओर इशारा किया। कोर्ट ने देखा कि सहानुभूति के आधार पर आर्थिक मदद, जो कि एक छोटा फ़ायदा है, कर्मचारी की मौत से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही के दौरान साफ़ तौर पर रोक दी जाती है; जबकि सहानुभूति के आधार पर नौकरी, जिससे पक्की सरकारी नौकरी और लंबे समय तक सेवा के फ़ायदे मिलते हैं, पर ऐसी कोई रोक नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इससे भ्रम और मुक़दमेबाज़ी हो सकती है और सुझाव दिया कि राज्य सरकार इस कानूनी कमी को दूर करने के लिए नियमों में बदलाव करने पर विचार करे। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि अदालतें नियमों में शब्द जोड़कर उस कमी को पूरा नहीं कर सकतीं।
अपील को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे नियमों के अनुसार तीन महीने के भीतर चौहान के सहानुभूति के आधार पर नौकरी के दावे पर उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करें और फ़ैसला लें।
Case Title – Atul Chauhan v. State of Haryana & Ors.