असफल संबंध आईपीसी की धारा 376 (2) (एन) के तहत बार-बार बलात्कार के लिए एफआईआर दर्ज करने का आधार नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2022-08-26 04:59 GMT

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल के मामले में अंसार मोहम्मद बनाम राजस्थान राज्य (2022 लाइव लॉ (एससी) 599) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून को दोहराया कि यदि शिकायतकर्ता स्वेच्छा से रिश्ते में रही है तो बार-बार बलात्कार भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध के लिए एफआईआर दर्ज करने का आधार नहीं हो सकता।

मामले के संक्षिप्त तथ्य

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 437 और 439 के तहत आपराधिक याचिका दायर की गई, जिसमें आईपीसी की धारा 376 (2) (एन) के तहत महिला से बार-बार बलात्कार करने के अपराध के लिए दर्ज याचिकाकर्ता/आरोपी नंबर 1 द्वारा नियमित जमानत मांगी गई।

पीड़ित पक्ष का मामला संक्षेप में यह है कि शिकायतकर्ता ने शिकायत दी कि वह याचिकाकर्ता/आरोपी नंबर 1 से 16 महीने से परिचित है और उक्त परिचित प्यार में बदल गया। आरोप है कि याचिकाकर्ता ने प्रेम का झांसा देकर और शिकायतकर्ता से शादी कर उसे अपने आवास पर ले जाकर उसका यौन शोषण किया। शिकायतकर्ता का जब मासिक धर्म बाधित हुआ तो उसे संदेह हुआ कि वह गर्भवती हो सकती है। याचिकाकर्ता और उसके परिवार ने उसे कुछ गोलियां दीं और मासिक धर्म फिर से शुरू हो गया। शिकायतकर्ता द्वारा यह आरोप लगाया गया कि उस समय से याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता ने उससे परहेज किया और फोन पर उसके साथ दुर्व्यवहार किया। अतः उपरोक्त अपराध दर्ज किया गया।

दोनों पक्षों की दलील

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर में आरोप अस्पष्ट हैं। एफआईआर में आरोपित अपराधों को छोड़कर कोई अपराध नहीं बनता है। यह तर्क दिया गया कि जब आरोपी नंबर 1 के माता-पिता शादी के लिए सहमत नहीं थे तो शिकायतकर्ता ने झूठा मामला दर्ज किया। अपने तर्क के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने अंसार मोहम्मद बनाम राजस्थान राज्य (2022 लाइव लॉ (एससी) 599) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया।

दूसरी ओर, विशेष सहायक लोक अभियोजक ने प्रस्तुत किया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। उन्होंने कहा कि अगर जमानत दी जाती है तो याचिकाकर्ता जांच में सहयोग नहीं कर सकता। हालांकि, स्त्री रोग विशेषज्ञ की अंतिम राय के अनुसार, हाल के किसी भी संभोग का कोई संकेत नहीं है।

न्यायालय का दृष्टिकोण

रिकॉर्ड के अवलोकन से पता चला कि शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता के बीच सहमति थी। यह भी प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि जब शिकायतकर्ता को लगा कि उसके और याचिकाकर्ता के बीच संबंध नहीं चल रहे हैं तो उसने वर्तमान शिकायत दर्ज की।

जस्टिस रवि चीमालापति का विचार था कि शिकायत तब दर्ज की गई जब संबंध नहीं चल रहे थे। चूंकि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मामले के तथ्यों पर पूरी तरह से लागू है, इसलिए न्यायालय ने कुछ शर्तों के साथ नियमित जमानत दी।

तदनुसार, आपराधिक याचिका की अनुमति दे दी गई।

केस टाइटल: जतोथ आदित्य राठौड़ बनाम आंध्र प्रदेश राज्य

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