सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) की आलोचना की। यह आलोचना प्राइवेट स्कूलों में आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के लिए 25% कोटा लागू करने से जुड़े मामले पर NCPCR के लापरवाह रवैये को लेकर की गई।

इसलिए कोर्ट ने NCPCR के चेयरपर्सन और डायरेक्टर को 'राइट टू फ्री एंड कम्पलसरी एजुकेशन एक्ट, 2009' (RTE Act) की धारा 12(1)(c) को असरदार ढंग से लागू करने से जुड़ी अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहने का निर्देश दिया। इस धारा के तहत प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूलों को अपनी कुल क्षमता का 25% हिस्सा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के छात्रों के लिए मुफ़्त शिक्षा के वास्ते आरक्षित करना ज़रूरी है।

बता दें, जनवरी में कोर्ट ने EWS छात्रों के लिए 25% सीटें आरक्षित करने के लिए कई निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि "पड़ोस के स्कूलों" (Neighbourhood Schools) का कॉन्सेप्ट क्लास, जाति और जेंडर की बाधाओं को तोड़ने के लिए बनाया गया। RTE Act के लागू होने की निगरानी के लिए NCPCR को एक पक्ष के तौर पर शामिल किया गया, जबकि इस मामले में पहले से ही एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SoP) मौजूद है।

यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने आया। बेंच ने NCPCR के हलफ़नामे को देखा और उसे "असंतोषजनक" बताया।

बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी (NCPCR की ओर से पेश हुईं) से कहा कि रिज़र्वेशन को असरदार ढंग से लागू करने में NCPCR की भूमिका बहुत अहम है।

जस्टिस नरसिम्हा ने कहा:

"ASG ऐश्वर्या, आप जानती हैं कि NCPCR की भूमिका बहुत अहम है। आपने हमारा फ़ैसला देखा है, है ना? यह एक कानूनी संस्था है; जो भी NCPCR का प्रमुख हो, उसे यह समझना होगा कि NCPCR पर कितनी उम्मीदें और भरोसा जताया गया। यह 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम' (Right to Education Act) के तहत एक रेगुलेटरी बॉडी है। इसलिए इस कानून की धारा 12 के तहत तय किए गए मकसद और लक्ष्यों—जैसे आस-पास के स्कूल वगैरह—को उन्हें हकीकत में बदलना होगा।"

उन्होंने आगे कहा:

"वे इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं? NCPCR का प्रमुख कौन है? हम उन्हें पेश होने के लिए कहेंगे। यह अदालत की अवमानना ​​का मामला नहीं है। यह सिर्फ़ जानकारी इकट्ठा करने का सवाल नहीं है; उन्हें धारा 12 के मकसद पर काम करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि आस-पास का हर स्कूल इस कॉन्सेप्ट को लागू करे।"

Case Details: DINESH BIWAJI ASHTIKAR Vs STATE OF MAHARASHTRA|SLP(C) No. 10105/2017 Diary No. 8696 / 2017

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