क्या PC Act के तहत मंज़ूरी न मिलने के बाद भी IPC के तहत मुक़दमा चल सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने IDBI बैंक के पूर्व अधिकारियों और बैंक बोर्ड में सरकारी नॉमिनी की याचिकाओं के एक समूह पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में उन्होंने 'प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट, 1988' (PC Act) के तहत मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी न मिलने के बाद भी 'इंडियन पीनल कोड' (IPC, अब 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' या BNS 2023) के तहत अपराधों के लिए अपने ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने को चुनौती दी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच मद्रास हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही और उनकी बर्खास्तगी रद्द करने से इनकार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं ने दो मुख्य तर्क रखे:
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) उस 'सेंट्रल विजिलेंस कमीशन' (CVC) के पास वापस जाए बिना अपनी पुलिस रिपोर्ट दायर नहीं कर सकती, जिसने जांच का निर्देश दिया।
एक बार जब PC Act की धारा 19 के तहत मेरिट के आधार पर मंज़ूरी देने से इनकार किया गया तो उन्हीं तथ्यों पर IPC के तहत कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के सामने कहा कि CVC ने 'सेंट्रल विजिलेंस कमीशन एक्ट, 2003' (CVC Act) की धारा 8(1)(b) और 8(1)(d) के तहत आदेश देकर जांच शुरू की। जांच PC Act के दायरे में न आने वाले अपराधों के लिए पुलिस रिपोर्ट के साथ समाप्त हुई, जिसमें IPC की धारा 420 (अब BNS 2023 की धारा 318(4)) भी शामिल है।
यह तर्क दिया गया कि CVC ही अंतिम फ़ैसला लेने वाली संस्था है और जब वह कानून के तहत जाँच का निर्देश देती है तो CBI को "CVC के पास वापस आना होता है, और फिर CVC निर्देश देती है कि रिपोर्ट दायर की जाए या नहीं।" यह भी बताया गया कि CBI "कभी भी CVC के पास वापस नहीं आई।"
उन्होंने कोर्ट का ध्यान CVC एक्ट की धारा 8B की ओर दिलाया। धारा 8B(2) के तहत दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट समेत किसी भी एजेंसी को कमीशन द्वारा भेजे गए मामलों की जांच करनी होती है और अपनी रिपोर्ट कमीशन को सौंपनी होती है। धारा 8B(3) के तहत कमीशन को "मिली हर रिपोर्ट पर विचार करना होगा" और वह स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने, या विभागीय कार्यवाही या कोई अन्य उचित कार्रवाई शुरू करने का फैसला कर सकता है।
बेंच ने पूछा कि क्या नियमों का पालन किया गया, जिस पर उन्हें बताया गया कि "ऐसा नहीं किया गया।"
CBI की ओर से पेश हुईं ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सेक्शन 8B(2) का पालन किया गया।
उन्होंने कहा,
"हमने CVC को एक रिपोर्ट भेजी थी, जिस पर विचार किया गया।"
उन्होंने CVC के हलफनामे का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि CBI ने अपनी रिपोर्ट की एक कॉपी CVC को भेजी थी। कमीशन ने सक्षम अधिकारियों की सिफारिशों के साथ रिपोर्ट पर विचार किया। ASG भाटी ने घटनाक्रम को इस तरह बताया: CBI मुकदमा चलाना चाहती थी, DFS और बैंक सहमत नहीं थे, CVC उनसे सहमत था और सक्षम अधिकारी CVC से सहमत थे।
बेंच ने पूछा कि इससे क्या पता चलता है कि कमीशन ने रिपोर्ट पर विचार किया और फिर CBI से आरोप दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा। ASG भाटी ने जवाब दिया कि CVC ने केवल PC Act के तहत अपराधों के लिए मना किया।
उन्होंने कहा,
"CBI के आगे बढ़ने पर कोई रोक नहीं है।"
उन्होंने आगे कहा,
"इससे CBI की उस मामले में आगे बढ़ने की शक्ति खत्म नहीं होती, जहां हमें कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) मिलता है।"
IPC के तहत मंज़ूरी (Sanction) का पैमाना "बहुत अलग" है, जिसमें "आधिकारिक कर्तव्य, गैर-आधिकारिक कर्तव्य, जांच का चरण" जैसी बातें शामिल होती हैं।
जस्टिस पारदीवाला ने CBI से पूछा,
"तो आपकी दलील यह है कि CVC ने सिर्फ़ भ्रष्टाचार के मामले में मना किया, IPC के मामले में नहीं?"
इस पर ASG भाटी ने हामी भरी।
कोर्ट को CVC की मंज़ूरी न देने की सिफारिश के बारे में भी बताया गया, जिसमें कहा गया कि कमीशन में मामले की जांच की गई और "कमीशन, सक्षम अधिकारी की सहमति से मुकदमा चलाने की मंज़ूरी न देने की सलाह देगा"। इसमें कहा गया कि सक्षम अधिकारी ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री — जिसमें CBI की रिपोर्ट और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूत शामिल हैं — पर विचार किया और PC Act की धारा 19 के तहत मंज़ूरी देने से इनकार किया।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि धारा 19 के तहत मंज़ूरी देने से मेरिट के आधार पर इनकार किया गया। उन्होंने पूछा कि क्या IPC की धारा 420 और 409 जैसे संबंधित अपराधों के लिए मुक़दमा जारी रह सकता है, जहां "अपराध के तत्व समान या एक जैसे हैं।" उन्होंने अधिकारियों द्वारा दर्ज किए गए कारणों के बारे में कोर्ट को बताया।
उन्होंने कहा कि CBI ने 12 पूर्व बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ़ मंज़ूरी मांगी थी, जिनमें से तीन सरकारी नियुक्तियां थीं। एक अधिकारी के मामले में सक्षम अधिकारी ने कहा कि यह फ़ैसला "किसी एक व्यक्ति की राय पर आधारित नहीं है, बल्कि एक सामूहिक फ़ैसला है।"
यह भी कहा गया कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे अधिकारी की किसी आपराधिक मंशा की पुष्टि हो सके।
ASG भाटी ने बेंच को बताया कि इस मामले में बैंक को लगभग 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
उन्होंने कहा,
"असल में उन्होंने जो किया वह यह था कि एक लोन को ठीक करने के लिए दूसरा लोन दे दिया।"
आगे कहा कि एक लोन का भुगतान दूसरे लोन के ज़रिए किया गया। यह बताया गया कि इसमें 29 आरोपी हैं, जिनमें से 12 कोर्ट के सामने हैं, बाकी लाभार्थी हैं और उन पर मुक़दमा चल रहा है।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी की और अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
Case Title : MS Raghavan & Ors. v. State represented by Inspector of Police