हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21 ए के तहत याचिका को स्थानांतरित करने की शक्ति का प्रयोग कब किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया

Update: 2020-11-09 05:52 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21 ए के तहत याचिका को स्थानांतरित करने की शक्ति केवल तब ही लागू की जा सकती है, जब बाद की याचिका या तो न्यायिक पृथक्करण (धारा 10 के तहत) या तलाक की मांग करने वाली याचिका (धारा 13 के तहत) हो।

जस्ट‌िस वी रामसुब्रमण्यन ने यह भी कहा कि नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 25 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट उपल्‍ब्‍ध शक्ति को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21 ए छीनती नहीं है।

इस मामले में, पति ने पुणे फैमिली कोर्ट के समक्ष तलाक की याचिका दायर की थी। बाद में, पत्नी ने फैमिली कोर्ट, नई दिल्ली के समक्ष वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की। दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एक दूसरे के खिलाफ मामले स्थानांतरित करने की मांग की।

पत्नी ने इस आधार पर पति की तलाक की याचिका पुणे से नई दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की कि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और पति कोई गुजाराभत्ता भी नहीं दे रहा है। दूसरी ओर, पति ने तर्क दिया कि तलाक के लिए उसकी याचिका पहले दायर की गई थी और इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 21 ए (2) (बी) के तहत, पत्नी द्वारा दायर याचिका जो बाद में दायर हुई है, पुणे स्थानांतरित की जाएगी।

धारा 21 ए एचएमए

धारा 21 ए इस प्रकार है: (ए) जहां इस अधिनियम के तहत विवाह में शामिल एक पक्ष ने जिला अदालत में या‌च‌ि‌का में दायर की, और धारा 10 के तहत न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए या धारा 13 के तहत तलाक की डिक्री के लिए प्रार्थना की गई है; और (बी) यदि याचिकाएं विभिन्न जिला अदालतों में दायर की जाती हैं, तो बाद में दायर याचिका को उस जिला अदालत में स्थानांतरित किया जाएगा, जिसमें पहली याचिका दायर की गई थी, और और दोनों याचिकाओं को वही जिला अदालत, जिसमें पहली याचिका दायर की गई थी, एक साथ सुनेगा और ‌निस्तारित करेगा।

उप-धारा 3 में यह प्रावधान है कि अदालत या सरकार, जैसा भी मामला हो, नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के तहत सक्षम, किसी भी मुकदमे कार्यवाही को उस जिला अदालत से, जिसमें बाद की याचिका दायर की गई है, उस जिला में स्थानांतरित करने के लिए, जिसमें पहली याचिका लंब‌ित है, अपनी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जैसा कि उन्हें उक्त संहिता के तहत ऐसा करने के लिए सशक्त किया गया है।

धारा 21 ए के उप-खंड (2) का, उप-खंड (1) के दायरे के बाहर कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है

अदालत ने पाया कि धारा 21 ए की उप-धारा (1) एक ऐसी स्थिति से संबंधित है, जिसमें विवाह का एक पक्ष, धारा 10 के तहत न्यायिक पृथक्करण के लिए या धारा 13 के तहत तलाक की डिक्री के लिए जिला न्यायालय के समक्ष याचिका दायर करता है, और उसके बाद विवाह का दूसरा पक्ष धारा 10 के तहत या धारा 13 के तहत, उसी जिला न्यायालय में याचिका दायर करता है, या एक उसी राज्य में एक अलग जिला न्यायालय में या अलग राज्य के जिला न्यायलय में याचिका दायर करता है।

कोर्ट ने कहा, "इस प्रकार के मामलों को, जिन्‍हें उप-धारा (1) द्वारा कवर किया गया है, उप-धारा (2) में निर्दिष्ट तरीकों से निस्तारित किया जाना चाहिए। धारा 21 ए की उप-धारा (2) का, उप-धारा (1) के दायरे के बाहर कोई अस्त‌ित्व नहीं है।

उप-धारा (1) और (2) का संयुक्त पठन यह दर्शाता है कि उप-धारा (2) के तहत निदृष्ट प्रक्रिया, उप-धारा (1) के तहत कवर की गई स्थितियों पर ही लागू होती है.... मौजूदा मामले में, पति ने पहले याचिका दायर की है, जो तलाक की याचिका है और इसलिए उसका मामला धारा 21 ए की उप-धारा (1) के खंड (ए) में फिट हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से उसके लिए, पत्नी द्वारा बाद में दायर याचिका धारा 9 के तहत दायर याचिका है और न हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 10 के तहत या धारा 13 के तहत दायर याचिका नहीं है। इस प्रकार, पत्नी की याचिका, हालांकि बाद की है, धारा 21 ए की उपधारा (1) के खंड (बी) के तहत नहीं आती है। परिणामस्वरूप, धारा 21 ए की उपधारा (1) मौजूदा मामले में लागू नहीं होगी, क्योंकि उसकी पूर्वशर्तें यहां संतुष्ट नहीं होती हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21 ए धारा 25 (1) सीपीसी के तहत सुप्रीम कोर्ट को उपलब्‍ध शक्ति को छीनती नहीं है।

"गुडा विजलक्ष्मी बनाम गुडा रामचंद्र शेखर शास्त्री मामले में, इस अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया कि धारा 25 सीपीसी में निहित प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 21 के कारण बाहर किए गए हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 21 में ‌‌‌द‌िए वाक्यांश 'अन्य प्रावधानों के अधीन हैं' पर इस न्यायालय ने केवल उन प्रावधानों को इंगित करने के लिए, टिप्पणी की ‌थी, जो अधिनियम के किसी भी प्रावधान के साथ असंगत हैं। इस न्यायालय द्वारा स्थानांतरण की शक्ति का प्रयोग करने के धारा 25 (1) निर्धारित एकमात्र परीक्षण "त्वर‌ित गति से न्याय" है।

अदालत ने मौजूदा मामले में पत्नी की स्‍थानांतरण याचिका को स्वीकार किया, और पति के प्रस्ताव समेत, जिसमें उसने कहा था कि वह पत्नी के आने-जाने का खर्च उठाएगा, उसकी याचिका खारिज कर दी।

केस:श्रुति कौशल बिष्ट बनाम कौशल आर बिष्ट [स्‍थानांतरण याच‌िका (CIVIL) 2019 का No.1264]

कोरम: जस्टिस वी रामसुब्रमणियन

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