सुप्रीम कोर्ट ने प्री-प्राइमरी स्तर (3-6 वर्ष) पर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा, “हम इस मुद्दे की जांच करना चाहते हैं।”

क्या है मामला?

वर्तमान में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए ही मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है और इसमें प्री-प्राइमरी शिक्षा शामिल नहीं है। वहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का उद्देश्य 3 वर्ष की आयु से ही सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, समान और मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराना है।

याचिका में क्या मांग की गई?

याचिकाकर्ता हरिप्रिया पटेल ने मांग की है कि संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार में निम्नलिखित अधिकारों को भी शामिल किया जाए:

पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता

उचित छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR)

सुलभ एवं बेहतर बुनियादी ढांचा

दिव्यांग बच्चों के लिए सहायक सेवाएं

शिक्षा फंड का प्रभावी उपयोग

साथ ही केंद्र सरकार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्कूल शिक्षा के लिए “समान न्यूनतम मानक” सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

अन्य प्रमुख मांगें

स्वतंत्र राष्ट्रीय स्कूल शिक्षा निगरानी प्राधिकरण या कोर्ट-निगरानी समिति का गठन

स्कूल-वार छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR), इंफ्रास्ट्रक्चर, बजट आवंटन और फंड उपयोग का सार्वजनिक खुलासा

दिव्यांग बच्चों के लिए सभी स्कूलों में बाधारहित (barrier-free) सुविधाएं, जैसे रैंप, सुलभ कक्षाएं और सुरक्षित प्रवेश-निकास

याचिका के प्रमुख तर्क

याचिका में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों, RTE Act और RPwD Act, तथा NEP 2020 जैसी नीतियों के बावजूद सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कई कमियां बनी हुई हैं, जैसे:

राज्यों के बीच बजट आवंटन में असमानता

कमजोर बुनियादी ढांचा

प्रारंभिक साक्षरता की कमी

असंतुलित छात्र-शिक्षक अनुपात

दिव्यांग बच्चों के लिए अपर्याप्त सहायता

उच्च ड्रॉपआउट दर

कम लर्निंग आउटकम

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि देश की बढ़ती GDP और प्रति व्यक्ति आय को देखते हुए सरकार के पास पर्याप्त संसाधन हैं, जिससे प्री-प्राइमरी शिक्षा को मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाया जा सकता है। उन्होंने यूनेस्को के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य देशों में प्री-प्राइमरी शिक्षा पहले से ही मुफ्त और अनिवार्य है।

संवैधानिक पहलू

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 और 45 का हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्य का दायित्व है कि 6 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा उपलब्ध कराई जाए।

साथ ही यह भी कहा गया कि RTE Act की धारा 11 में “may” शब्द के कारण प्री-प्राइमरी शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जा सका है, जिसे व्यापक व्याख्या के जरिए दूर करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी यह नोटिस शिक्षा के अधिकार के दायरे को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह मामला तय कर सकता है कि क्या प्री-प्राइमरी शिक्षा को भी मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जाएगी या नहीं।

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