सुप्रीम कोर्ट ने एयरपोर्ट पर दिव्यांगों के लिए आसान सुविधाओं के सही रखरखाव की मांग वाली PIL पर नोटिस जारी किया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक PIL पर नोटिस जारी किया। इस PIL में एयरपोर्ट पर दिव्यांगों के लिए आसान सुविधाओं (जैसे टैक्टाइल पाथवे, ब्रेल साइनबोर्ड, बैठने की आसान व्यवस्था और प्राथमिकता के आधार पर चेक-इन) के सही रखरखाव की मांग की गई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA), भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और डिजी यात्रा फाउंडेशन से जवाब मांगा।
तुराब चिमथानवाला द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) में संबंधित अधिकारियों की "सिस्टम से जुड़ी और लगातार हो रही विफलता" को चुनौती दी गई। यह विफलता भारत में नागरिक उड्डयन से जुड़े एक्सेसिबिलिटी स्टैंडर्ड्स और नियमों को लागू करने और उन्हें चालू रखने में हुई। इनमें 'नागरिक उड्डयन के लिए एक्सेसिबिलिटी स्टैंडर्ड्स और गाइडलाइंस 2022', 'दिव्यांगजन अधिकार नियम 2017' का नियम 15(1)(f), और DGCA द्वारा जारी 'हवाई यात्रा - दिव्यांगजन (Divyangjan) और/या कम गतिशीलता वाले व्यक्ति (PRM)' (PRM-CAR) से संबंधित नागरिक उड्डयन आवश्यकताएं शामिल हैं।
उनका कहना है कि एक व्यापक कानूनी और नियामक ढांचा होने के बावजूद, कोई सही निगरानी तंत्र (मॉनिटरिंग मैकेनिज्म) नहीं है जो 2022 के स्टैंडर्ड्स और गाइडलाइंस और PRM-CAR के कार्यान्वयन को सुनिश्चित कर सके।
आगे कहा गया,
"इस सिस्टम से जुड़ी विफलता के कारण नागरिक उड्डयन इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं में लगातार और बड़े पैमाने पर एक्सेसिबिलिटी की कमी बनी हुई। इसमें एयरपोर्ट पर दिव्यांगों के लिए आसान सुविधाओं का अभाव, साइनबोर्ड और नेविगेशन सिस्टम का सही न होना, डिजी यात्रा जैसे डिजिटल और बायोमेट्रिक सिस्टम का दिव्यांगों के अनुकूल न होना, बुकिंग और चेक-इन सिस्टम का दिव्यांगों के लिए आसान न होना, मोबिलिटी एड्स (चलने-फिरने में मदद करने वाले उपकरण) को ठीक से न संभालना, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, जबरदस्ती या गलत तरीके से मदद करना, और सम्मानजनक व आसान स्क्रीनिंग और इमिग्रेशन प्रक्रियाओं का अभाव शामिल है। ये विफलताएं कानूनी नियमों और दिव्यांगजनों (PwDs) के मौलिक अधिकारों का लगातार उल्लंघन हैं।"
याचिकाकर्ता दिव्यांगजनों के मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग कर रहा है, जिसमें 'एक्सेसिबिलिटी का अधिकार' भी शामिल है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(d) और 21 का एक अभिन्न अंग है। उनका कहना है कि राज्य और उसकी एजेंसियों की यह "अनिवार्य ज़िम्मेदारी" है कि वे यह सुनिश्चित करें कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और सेवाओं का इस्तेमाल दिव्यांगजन (PwDs) भी दूसरों के बराबर कर सकें।
यह याचिका वकील राहुल बजाज, अमर जैन, सारा और अमृतश मिश्रा ने तैयार की है और इसे AoR आशुतोष सेंगर के ज़रिए दायर किया गया।
Case Title : Turab Chimthanawala v. Union of India and Ors.