सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जुलाई में जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR की जांच की मांग करने वाली याचिका यह देखते हुए खारिज की कि याचिकाकर्ता मूल रूप से FIR रद्द करने के अदालत के पहले के आदेश की समीक्षा की मांग कर रहा है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ एल रामनाथन द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने तर्क दिया कि पुलिस के कार्यों में कोई न्यायिक हस्तक्षेप नहीं हो सकता, क्योंकि वे "स्वतंत्र और संप्रभु" हैं। विशेष रूप से, याचिका अदालत द्वारा FIR रद्द करने के 1 सितंबर के आदेश को पारित करने से पहले दायर की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील मैथ्यूज जे नेदुम्पारा ने वास्तविक वादियों की अनुपस्थिति में जनहित याचिका की स्थिरता पर सवाल उठाया और टिप्पणी की कि लोगों ने अदालत से संपर्क किया जैसे कि यह उनकी "निजी संपत्ति" हो।

चीफ जस्टिस ने बताया कि न्यायालय ने छात्र प्रदर्शनकारियों की परिस्थितियों और उनके भविष्य पर विचार करने के बाद FIR रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया।

CJI ने कहा,

"आप कहते हैं कि हमें अनुच्छेद 142 लागू नहीं करना चाहिए और FIR रद्द नहीं करनी चाहिए। कृपया सराहना करें, ये युवा छात्र हैं। हमें उनके माता-पिता, उनके भविष्य को देखना है। हम नहीं चाहते कि उन्हें अदालत में आना पड़े।"

CJI ने एक हालिया आदेश का भी जिक्र किया जिसमें हिमाचल प्रदेश में कोविड-19 महामारी के दौरान हुए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों पर आपराधिक मामलों को रद्द कर दिया गया।

CJI ने टिप्पणी की,

"हिमाचल प्रदेश में, वे धरने पर बैठ गए, उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। लेकिन जब कोविड था, तो इस देश के लोग इस तरह के संकट का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए लोगों ने अपनी तरह से प्रतिक्रिया दी।"

चीफ जस्टिस ने कहा कि जबकि हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार किया था, सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार करने के बाद हस्तक्षेप किया कि प्रदर्शनकारी युवा छात्र हैं और कठोर अपराधी नहीं हैं।

पीठ ने अंततः यह देखते हुए याचिका खारिज की कि मांगी गई राहत प्रभावी रूप से FIR रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले को चुनौती देने के समान है।

CJI ने नेदुमपारा से कहा,

"आपके मुवक्किल को हमारा आदेश देखना चाहिए। यह याचिका हमारे आदेश (अनुच्छेद 142 को लागू करके एफआईआर को रद्द करना) की समीक्षा की मांग करने जैसी है।"

गौरतलब है कि 20 जुलाई को 'संसद चलो' प्रदर्शन का आह्वान कॉकरोच जनता पार्टी (CJI) ने नीट पेपर लीक और शिक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर किया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस द्वारा कथित हिंसा को लेकर प्रदर्शनकारी छात्रों और अन्य लोगों के खिलाफ कई FIR दर्ज की गईं।

बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आक्रोश के बाद 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारी विरोध प्रदर्शन के संबंध में छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को बंद/वापस ले सकते हैं। राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए CJP नेताओं के साथ बातचीत के दौरान संघ द्वारा उक्त एफआईआर को वापस लेने पर सहमति व्यक्त की गई।

याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की कि पुलिस, न्यायपालिका की तरह, कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की जांच करने और दोषियों को सजा दिलाने में संप्रभु और स्वतंत्र है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि पुलिस के संप्रभु कार्य में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है, जब तक कि पुलिस ने कानून के विपरीत कार्य नहीं किया है, जो तथ्य का एक विवादित प्रश्न है।

याचिका में केंद्र, दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई कि जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन पर दर्ज FIR की जांच स्वतंत्र, निष्पक्ष और कानून के अनुसार की जाए।

Case : L Ramanthan v Union of India | WP(c) 1020/2026

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