सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाई। मामला 1996 में थूथुकुडी (तूतीकोरिन) में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान हुए संपत्ति और व्यापार के नुकसान के मुआवजे से जुड़ा है। कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि वह पीड़ितों को समय पर राहत क्यों नहीं दिला पाई।

जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक दंगों और आगजनी के बाद शिकायतों को दूर करने के लिए आयोग तो बनाए जाते हैं, लेकिन प्रशासन यह सुनिश्चित करने में अक्सर नाकाम रहता है कि पीड़ितों तक वादा की गई राहत पहुंचे।

जस्टिस भट्टी ने कहा,

"मैं इस मामले से इतना तंग आ चुका हूं कि लगता है मेरे रिटायर होने तक भी यह ऐसे ही चलता रहेगा... यह एक सीधा-सा मामला है; राज्य सरकार को इसे बेवजह टालना नहीं चाहिए।"

यह टिप्पणी तब आई जब बेंच को बताया गया कि पिछले शनिवार को सुनवाई टालने (स्थगन) के लिए एक पत्र भेजा गया।

यह मामला 1996 का है, जब थूथुकुडी में सांप्रदायिक दंगों के कारण लोगों के व्यापार और संपत्तियों को नुकसान पहुंचा था। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने एक पूर्व जिला जज को 'एक सदस्यीय आयोग' के रूप में नियुक्त किया, ताकि नुकसान का आकलन किया जा सके और पीड़ितों को मुआवजा देने की सिफारिश की जा सके।

आयोग ने हुए वास्तविक नुकसान के आधार पर मुआवजा देने की सिफारिश की थी। हालांकि, बाद में राज्य सरकार ने आदेश (G.O.Ms.No.1834) जारी किया, जिसके तहत सभी प्रभावित लोगों को एक समान 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का फैसला लिया गया।

इस फैसले को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। सिंगल जज और डिवीजन बेंच दोनों ने ही एक सदस्यीय आयोग की सिफारिशों के अनुसार मुआवजा देने के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो बेंच ने बार-बार सुनवाई टालने पर नाराजगी जताई।

जस्टिस भट्टी ने सवाल किया कि कोर्ट को कितनी बार सुनवाई की तैयारी करनी पड़ेगी, जबकि हर बार मामला टाल दिया जाता है?

राज्य सरकार के वकील ने जवाब (Rejoinder) दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय माँगा। लेकिन कोर्ट ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। जस्टिस भट्टी ने याद दिलाया कि यह घटना 1996 में हुई थी और यह मामला दशकों से सुलझा नहीं है।

जस्टिस भट्टी ने टिप्पणी की,

"पैसे, मुआवजे या भरपाई के मामले में अगर हम मांगी गई सभी राहतों को पूरी तरह मान भी लें तो भी यह न्याय नहीं होगा।"

कार्यवाही के दौरान राज्य के रवैये की आलोचना करते हुए उन्होंने इस मामले में बार-बार सुनवाई टालने (Adjournments) का जिक्र किया और वकील से कहा कि वह अदालत की स्थिति को भी समझें।

उन्होंने कहा,

"राज्य अपने मामलों को इसी तरह पेश कर रहा है... सुनवाई टालने के एक के बाद एक आदेश (RoP) देखिए। अदालत की स्थिति को भी समझिए। क्या आप मेरी निजी राय और टिप्पणियां सुनना चाहते हैं?"

जज ने सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों की शिकायतों को दूर करने के प्रति राज्य के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अक्सर आयोगों (Commissions) के गठन से लोगों को यह उम्मीद बंध जाती है कि उनके नुकसान की भरपाई की जाएगी।

जस्टिस भट्टी ने टिप्पणी की,

"आज आप अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहे हैं और इस मामले को सुलझाने के लिए मोलभाव कर रहे हैं। हम सांप्रदायिक दंगों को रोकने में सक्षम नहीं हैं; संपत्तियों में आग लगा दी जाती है और लूटपाट होती है। तुरंत राहत के नाम पर हम आयोग बना देते हैं। हम भाषण देते हैं कि सब कुछ ठीक कर दिया जाएगा। एक व्यवस्था बनी हुई है और लोगों को लगता है कि उनकी शिकायतें दूर हो जाएंगी।"

अंत में, बेंच ने मामले की सुनवाई मंगलवार तक के लिए टाल दी। जस्टिस भट्टी ने राज्य सरकार से पूछा कि मुआवजे के भुगतान में इतनी लंबी देरी के लिए क्या कड़ा परिणाम (Exemplary Consequences) होना चाहिए।

अदालत को बताया गया कि राज्य ने मुआवजे की 50% राशि पहले ही जमा की।

जस्टिस भट्टी ने वकील से कहा,

"इस तरह के मामलों में अगर राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है, तो हम उसकी कोई मदद नहीं करेंगे।"

Case Title : THE GOVERNMENT OF TAMIL NADU Vs D.G.RAJAN ALIAS GNANARAJ

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