सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान के साथ संवेदनशील सैन्य जानकारी साझा करने के आरोपी व्यक्ति की जमानत रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट का वह आदेश खारिज किया, जिसमें जासूसी के मामले के आरोपी को केवल इस आधार पर नियमित जमानत दी गई कि उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए गए।
खंडपीठ ने कहा,
"गिरफ्तारी के कारणों को बताने के तरीके या रूप को लेकर उठाई गई कोई बहुत ही तकनीकी आपत्ति, जमानत से जुड़े मुख्य नियमों को दरकिनार करते हुए नियमित जमानत पाने का कोई स्वतः आधार नहीं बन सकती।"
जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए प्रतिवादी झाबरा राम को आदेश की तारीख से दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया। अदालत ने दोहराया कि गिरफ्तारी के कारण बताना एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपाय है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि इस मामले में नियमों का पर्याप्त और प्रभावी ढंग से पालन किया गया था। इससे आरोपी को कोई नुकसान (Prejudice) नहीं पहुंचा है।
यह मामला 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923' (OSA) की धारा 3 और 9, तथा 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' (BNS) की धारा 152 और 238(b) के तहत अपराधों से जुड़ा है। आरोप है कि प्रतिवादी, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के विदेशी हैंडलर्स के संपर्क में था और पैसों के बदले पोखरण और जैसलमेर से संवेदनशील सैन्य तस्वीरें, वीडियो और सैनिकों की आवाजाही की जानकारी उन्हें भेज रहा था।
FIR दर्ज होने से पहले प्रतिवादी को पूछताछ केंद्रों पर पेश होने के लिए कई नोटिस भेजे गए। इसके बाद उसके खिलाफ FIR दर्ज की गई और 30 जनवरी 2026 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया। दो गवाहों की मौजूदगी में उसे 'अरेस्ट मेमो' (गिरफ्तारी ज्ञापन) पढ़कर सुनाया गया, जिस पर उसके हस्ताक्षर भी हैं। साथ ही 'अरेस्ट इंफॉर्मेशन मेमो' (गिरफ्तारी सूचना ज्ञापन) के अनुसार, उसके भाई को भी फोन पर उसकी गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।
31 जनवरी 2026 को प्रतिवादी को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। वहां उसने पुलिस कस्टडी रिमांड का विरोध तो किया, लेकिन न तो उसने और न ही उसके वकील ने इस बात को लेकर कोई शिकायत की कि उसे गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए। 10 मार्च 2026 को एडिशनल जिला एवं सेशंस जज ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज की। अदालत ने माना कि हस्ताक्षरित 'अरेस्ट मेमो' (गिरफ्तारी ज्ञापन) का होना, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47 के प्रावधानों का मूल रूप से पालन करने के समान है।
बाद में 18 मई 2026 को हाईकोर्ट ने इस आधार पर जमानत दी कि गिरफ्तारी के कारणों को रिमांड से पहले या रिमांड के समय लिखित रूप में नहीं बताया गया।
'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले के संदर्भ में अदालत ने माना कि केवल मौखिक रूप से जानकारी देना या केस डायरी में प्रविष्टि करना, BNSS की धारा 47 की शर्तों को पूरा नहीं करता है।
हाईकोर्ट के इस आदेश से असंतुष्ट होकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
Case Title : State of Rajasthan v Jhabra Ram