सबरीमाला संदर्भ: 'करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना कठिन' — सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Update: 2026-04-15 12:33 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला संदर्भ की सुनवाई के दौरान बुधवार को मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत घोषित करना अदालत के लिए बेहद कठिन कार्य है। यह टिप्पणी चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की।

सुनवाई के चौथे दिन, सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, Travancore Devaswom Board की ओर से दलीलें पेश कर रहे थे। उन्होंने उस प्रश्न पर तर्क दिया कि क्या कोई तीसरा व्यक्ति (जो उस धर्म का अनुयायी न हो) जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है।

PIL पर 'उच्च मानदंड' की जरूरत

सिंघवी ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में बहुत उच्च स्तर (high threshold) अपनाना चाहिए और सदियों पुरानी परंपराओं को बाहरी व्यक्तियों द्वारा चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि

“धर्म करोड़ों लोगों की आस्था है, किसी तीसरे व्यक्ति को सीधे अनुच्छेद 32 के तहत इसे बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”

इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक काल्पनिक उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि कोई धार्मिक नेता मोक्ष के लिए सामूहिक आत्महत्या का उपदेश दे, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती? इस पर सिंघवी ने इसे “अत्यंत असाधारण स्थिति” बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

'अदालत स्वयं भी संज्ञान ले सकती है'

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि ऐसे चरम मामलों में अदालत स्वतः संज्ञान (suo motu) भी ले सकती है। हालांकि, सिंघवी ने स्पष्ट किया कि वे PIL पर पूर्ण प्रतिबंध की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन सामान्य धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर रोक होनी चाहिए।

तीसरे पक्ष की याचिकाओं पर आपत्ति

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यदि कोई प्रभावित व्यक्ति स्वयं अदालत नहीं आता, तो तीसरे पक्ष द्वारा दायर याचिका (interloper) खारिज की जा सकती है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरश ने भी सवाल उठाया कि क्या अदालत करोड़ों श्रद्धालुओं को सुने बिना फैसला दे सकती है?

सबरीमाला की विशिष्ट धार्मिक प्रकृति

सिंघवी ने तर्क दिया कि सबरीमाला मंदिर का मामला सामान्य संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट धार्मिक प्रकृति को समझकर तय किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान भगवान अयप्पा को “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” (eternal celibate) रूप में पूजा जाता है, और यही मंदिर की परंपराओं व आस्थाओं का आधार है।

उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर में प्रवेश से पहले 41 दिनों का व्रत (vratam) अनिवार्य है, जो इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महिलाओं के प्रवेश पर तर्क

समानता के प्रश्न पर सिंघवी ने कहा कि यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, क्योंकि 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है। उन्होंने इसे आयु-आधारित वर्गीकरण बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य मंदिर की धार्मिक पहचान को बनाए रखना है।

साथ ही, उन्होंने कहा कि प्रतिबंधित आयु वर्ग की महिलाएं अन्य अयप्पा मंदिरों में पूजा कर सकती हैं, इसलिए इसे पूर्ण वंचना नहीं माना जा सकता।

मामले की सुनवाई 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है, जिसमें जस्टिस नागरत्ना, जस्टिस सुंदरश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

फिलहाल सुनवाई जारी है और यह इसका चौथा दिन है।

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