जल अधिनियम की धारा 48 के तहत मुकदमा का सामना कर रहे लोक सेवकों को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अनुमोदन संबंधी संरक्षण उपलब्ध नहीं है: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2021-07-19 04:07 GMT

पिछले हफ्ते सुनाए गए एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम की धारा 197 के तहत मुकदमा का सामना कर रहे लोक सेवकों के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं है।

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की खंडपीठ ने 'वी.सी. चिन्नप्पा गौदर बनाम कर्नाटक सरकार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' और 'कर्नाटक सरकार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाम बी. हीरा नायक' के मामलों में पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा :

1. यदि जल अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किसी विभाग से हुआ है, जिसकी पुष्टि जल अधिनियम की धारा 48 के तहत जरूरी बातों से हो जाती है तो "विभाग प्रमुख" को दोषी माना जाएगा। यह निश्चित रूप से उन बचावों के अधीन होगा जो यह स्थापित करने के लिए उपलब्ध हैं कि क्या विचाराधीन अपराध उनकी जानकारी के बिना किया गया था या कि उन्होंने इस तरह के अपराध रोकने के लिए सभी उचित कदम उठाये थे।

2. जल अधिनियम की धारा 48 के तहत काल्पनिक मानने के कारण, संहिता की धारा 197 के तहत सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी और मामले को इस तरह के संरक्षण से परे विचार किया जाना चाहिए।

3. यदि संबंधित लोक सेवक किसी नगर परिषद या नगर पंचायत का मुख्य अधिकारी या आयुक्त होता है, तो उसे कड़ाई से "सरकार के विभाग का प्रमुख" नहीं कहा जा सकता है। इसलिए मामला जल अधिनियम की धारा 48 के तहत नहीं आएगा, बल्कि मामला सीधे जल अधिनियम की धारा 47 के तहत आएगा। ऐसे मामलों में भी, जल अधिनियम की धारा 47 के तहत काल्पनिक लोक सेवक मानने के उपलब्ध प्रावधान उस लोक सेवक को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत संरक्षण से वंचित कर देगा।

4. यदि अपराधी लोक सेवकों के अलावा अन्य हैं या जहां प्रमुख अपराधी निजी क्षेत्रों में कॉर्पोरेट संस्थाएं हैं, तो धारा 197 के तहत सुरक्षा का सवाल ही नहीं उठता।

इस मामले में, कर्नाटक के बेल्लारी जिला स्थित संदूर ग्राम पंचायत और उक्त ग्राम पंचायत के मुख्य अधिकारी पर जल अधिनियम की धारा 43 और 44 के तहत दंडनीय अपराध का आरोप लगाया गया था। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अधिकारी को इन अपराधों का दोषी पाया था और उसे सजा सुनायी थी।

सत्र न्यायाधीश ने अपील की अनुमति देते हुए कहा कि वह सीआरपीसी की धारा 197 के तहत संरक्षण के हकदार हैं और आवश्यक मंजूरी के अभाव में उनका अभियोजन अमान्य था। हाईकोर्ट ने कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दायर अपील मंजूर करते हुए कहा कि संहिता की धारा 197 के तहत संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा। चूंकि इस मामले पर निचली अपीलीय अदालत द्वारा मेरिट के आधार पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए उच्च न्यायालय ने मामले को मेरिट के आधार पर नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया।

आरोपी द्वारा दायर अपील में, पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने 'वी.सी. चिन्नप्पा गौदर' मामला, का उल्लेख किया है, जिसमें यह पाया गया था कि "विभाग के प्रमुख" को प्रावधान के आधार पर दोषी माना जाएगा और इस तरह, संहिता की धारा 197 के तहत संरक्षण से बाहर रखा जाएगा।

'बी हीरा नाइक' मामले का भी जिक्र करते हुए, पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा:

12. यदि हम वर्तमान मामले को इन अभिधारणाओं के आलोक में देखें, तो मामला पूरी तरह से बी. हीरा नाइक (सुप्रा) मामले में इस न्यायालय के निर्णय के दायरे में है। 13. इसलिए, हाईकोर्ट निचली अपीलीय न्यायालय के निर्णय को रद्द करने में सही और न्यायोचित था, जो विशुद्ध रूप से संहिता की धारा 197 के लागू होने के मसले पर आधारित था। इन परिस्थितियों में, हाईकोर्ट ने मामले को निचली अपीलीय अदालत में योग्यता के आधार पर नए सिरे से विचार करने के लिए भेजकर सही किया है।

मामला: नूरुल्ला खान बनाम कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड [क्रिमिनल अपील 599 / 2021]

कोरम: न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी

वकील: एओआर शैलेश मडियाल, एओआर पुरुषोत्तम शर्मा त्रिपाठी, एओआर विक्रम हेगड़े, एएसजी ऐश्वर्या भाटी

साइटेशन : एलएल 2021 एससी 305

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