भोपाल गैस त्रासदी के कचरे से पारे के रिसाव की चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट में जाने को कहा

Update: 2026-03-16 10:09 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े यूनियन कार्बाइड के विषाक्त कचरे के दहन के बाद बची राख से पारे (Mercury) के रिसाव की आशंका संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चूंकि इस मामले की निगरानी पिछले दो दशकों से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट कर रहा है, इसलिए याचिकाकर्ता वहां उपयुक्त सामग्री के साथ आवेदन दाखिल कर सकते हैं।

याचिका भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यूनियन कार्बाइड के विषाक्त कचरे के दहन के बाद बची राख में पारे की मौजूदगी के कारण भूजल और आसपास के पर्यावरण के प्रदूषित होने का खतरा है।

याचिकाकर्ता ने आईआईटी हैदराबाद के डॉ. आसिफ कुरैशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दहन किए गए पदार्थ में पारे की मात्रा अधिक हो सकती है, जिससे भविष्य में मिट्टी और भूजल में पारे का रिसाव हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता भविष्य में संभावित रिसाव की आशंका से संबंधित सामग्री के साथ हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल करें। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि हाईकोर्ट इस मामले पर शीघ्र सुनवाई करेगा और जनहित में आवश्यक आदेश पारित करेगा।

यह याचिका मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 10 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी, जिसमें धार जिले के पीथमपुर स्थित ट्रीटमेंट, स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी (TSDF) में कचरे के निस्तारण की अनुमति दी गई थी।

इससे पहले अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह स्थान मानव आबादी से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं उत्पन्न होती हैं। हालांकि बाद में दिसंबर 2025 में अदालत ने अपने पूर्व आदेश को स्थगित रखते हुए कचरे के निस्तारण की अनुमति दे दी थी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद कचरे को जला दिया गया, लेकिन बची राख में पारे के रिसाव का खतरा बना हुआ है।

ग्रोवर ने कहा कि वर्ष 2015 में अवशेष मिट्टी में लगभग 15 किलोग्राम पारा पाया गया था। जबकि 2025 की परीक्षण रिपोर्ट में दावा किया गया कि राख में पारा नहीं पाया गया। उन्होंने इस निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए डॉ. कुरैशी के हालिया शोध का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि परीक्षण के दौरान पारे की सही माप नहीं की गई।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर विशेषज्ञ समितियों द्वारा जांच और विचार-विमर्श होना आवश्यक है, और यह प्रक्रिया हाईकोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए।

जस्टिस बागची ने कहा कि यदि विशेषज्ञ रिपोर्ट में अपनाई गई पद्धति में खामी बताई गई है, तो संबंधित समिति को उस पर प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया जाना चाहिए और यह पूरा विचार-विमर्श हाईकोर्ट के समक्ष होना चाहिए।

ग्रोवर ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि कंक्रीट बॉक्स में रखी राख को खोलकर पारे की जांच कराई जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मामला पहले से ही हाईकोर्ट की निगरानी में है।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे इस संबंध में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष नया आवेदन दाखिल करेंगे।

याचिका में यह भी कहा गया कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2024 में नोटिस जारी कर पीथमपुर सुविधा केंद्र से विषाक्त पदार्थों के रिसाव से भूजल प्रदूषण की आशंका जताई थी, जो लगभग 50 मीटर दूर तक जल स्रोतों को प्रभावित कर सकता है।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि 2025 की परीक्षण रिपोर्ट में पारे की मौजूदगी को सही तरीके से नहीं आंका गया और दहन के दौरान इस्तेमाल किए गए पदार्थों के कारण पारा अवशिष्ट राख में फंस सकता है, जिससे परीक्षण के निष्कर्ष गलत हो सकते हैं।

मामले को लेकर अब याचिकाकर्ता मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आगे की राहत के लिए आवेदन दाखिल करेंगे।

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