सुप्रीम कोर्ट में याचिका: 'कॉकरोच जनता पार्टी' और फर्जी वकीलों के खिलाफ CBI जांच की मांग

Update: 2026-05-24 15:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें "कॉकरोच जनता पार्टी" से जुड़ी गतिविधियों की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से जांच कराने की मांग की गई। यह एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान है, जो सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान हाल ही में की गई कुछ टिप्पणियों के बाद शुरू हुआ था।

याचिका में नकली वकीलों और फर्जी कानून डिग्रियों की भी जांच की मांग की गई। इसमें दावा किया गया कि ये मुद्दे कानूनी व्यवस्था के भीतर पेशेवर मानकों में आई गहरी गिरावट को दर्शाते हैं।

राजा चौधरी द्वारा दायर इस याचिका में उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई, जो कथित तौर पर कोर्टरूम में की गई मौखिक टिप्पणियों का व्यावसायिक लाभ उठाने में शामिल हैं। इसमें ट्रेडमार्क का गलत इस्तेमाल करने और कोर्ट की कार्यवाही के दौरान की गई टिप्पणियों को पैसे कमाने के मकसद से फैलाने के आरोप शामिल हैं।

याचिका के अनुसार, हाल ही में हुई एक सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियों को चुनिंदा तरीके से काटकर, संदर्भ से हटाकर (out of context), वायरल सोशल मीडिया कंटेंट, मीम्स और व्यावसायिक सामग्री में बदल दिया गया।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि इस याचिका का उद्देश्य न्यायपालिका की वैध आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य या संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना नहीं है। इसके बजाय, इसमें आरोप लगाया गया कि कोर्ट की कार्यवाही का संगठित तरीके से गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें डिजिटल माध्यम से पैसे कमाने और कोर्टरूम की बातचीत का व्यावसायिक लाभ उठाने जैसे काम शामिल हैं।

याचिका में भारत सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन को प्रतिवादी बनाया गया।

यह याचिका इस महीने की शुरुआत में हुई एक सुनवाई के संदर्भ में दायर की गई। उस सुनवाई में एक वकील 'सीनियर एडवोकेट' का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे थे। सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने पेशेवर मानकों और इस पेशे में नकली वकीलों के घुसपैठ करने की चिंताओं को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं। उन्होंने एक टिप्पणी में उन बेरोजगार युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' से की थी, जो मीडिया, सोशल मीडिया और RTI के माध्यम से सक्रियता (Activism) की ओर मुड़ रहे हैं। बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियां उन लोगों के लिए थीं, जो फर्जी डिग्रियों के सहारे इस पेशे में शामिल हो रहे हैं।

याचिका में कहा गया कि कोर्टरूम की बातचीत के कुछ हिस्सों को बाद में काटकर, बिना किसी संदर्भ के ऑनलाइन फैला दिया गया। इसके परिणामस्वरूप ट्रोलिंग, मीम्स, नकल (Mimicry) और मूल कार्यवाही से पूरी तरह अलग होकर उन टिप्पणियों का बड़े पैमाने पर प्रसार हुआ।

इस सुनवाई के बाद "कॉकरोच जनता पार्टी" नाम से सोशल मीडिया आंदोलन शुरू हुआ। कोर्टरूम की टिप्पणियों को लेकर उठे विवाद के बाद, इस आंदोलन को सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रियता और समर्थन मिला।

याचिका में दावा किया गया कि इस विवाद को ब्रांडिंग, प्रचार-प्रसार, ऑनलाइन जुड़ाव बढ़ाने और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया। याचिका में यह तर्क दिया गया कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान हुई मौखिक बातचीत को व्यावसायिक डिजिटल संपत्ति, राजनीतिक ब्रांडिंग या उनके न्यायिक संदर्भ से अलग करके पैसे कमाने वाले सार्वजनिक तमाशे में नहीं बदला जा सकता।

इसमें कहा गया,

"गतिशील न्यायिक कार्यवाही के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां अंतिम निर्णय नहीं होतीं और संवैधानिक रूप से उनका उपयोग व्यावसायिक शोषण, राजनीतिक ब्रांडिंग, मीम बेचने, ट्रेडमार्क लाभ लेने, या न्यायिक संदर्भ से अलग करके डिजिटल माध्यम से पैसे कमाने के लिए नहीं किया जा सकता। ऐसी संस्थाओं और प्रतीकात्मक अभियानों का उभरना, जो कथित तौर पर प्रचार, व्यापारिक उपयोग, व्यावसायिक जुड़ाव और डिजिटल लामबंदी के लिए अदालत की अभिव्यक्तियों का उपयोग करते हैं, संवैधानिक कार्यवाही के खतरनाक रूप से वस्तुकरण को दर्शाता है।"

याचिका में "Cockroach Janta Party" अभिव्यक्ति के लिए दायर किए गए कई ट्रेडमार्क आवेदनों पर प्रकाश डाला गया; यह तब हुआ जब इस व्यंग्यात्मक समूह ने अपने लॉन्च के कुछ ही दिनों के भीतर सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स बना लिए।

याचिका में तर्क दिया गया कि मुद्दा न्यायपालिका की आलोचना या अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित लोकतांत्रिक असहमति नहीं है, बल्कि अदालत की मौखिक कार्यवाही का "संगठित व्यावसायिक शोषण", ट्रेडमार्क के रूप में व्यवसायीकरण और पैसे कमाने के लिए उसका प्रसार है। याचिका में कहा गया कि निर्णयों की आलोचना की अनुमति है, लेकिन अदालत की बातचीत का व्यावसायिक उपयोग करने की अनुमति नहीं है।

याचिका में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष के हालिया बयानों का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि लगभग 35-40% वकील फ़र्ज़ी हैं।

याचिका में यह तर्क दिया गया कि संवैधानिक अदालतें जनता के भरोसे और संस्थागत विश्वास पर निर्भर करती हैं। इसमें यह भी कहा गया कि मौखिक बातचीत के चुनिंदा हिस्सों को काटकर प्रसारित करने से न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचने का खतरा रहता है।

याचिका में एक स्वतंत्र जांच का निर्देश देने की माँग की गई, जो बेहतर होगा कि CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी द्वारा की जाए, ताकि फ़र्ज़ी वकीलों, जाली क़ानूनी डिग्रियों, क़ानूनी पेशे में किसी और की जगह काम करने (Impersonation) और क़ानूनी पेशे में पेशेवर मानकों में आई गिरावट से जुड़े आरोपों की जांच की जा सके।

इसके अलावा, याचिका में सक्षम अधिकारियों को यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि वे उन व्यक्तियों या संस्थाओं की जांच करें और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करें, जो कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान अदालत में की गई मौखिक टिप्पणियों का व्यावसायिक शोषण, ट्रेडमार्क के रूप में इस्तेमाल, पैसे लेकर प्रसार या अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग करने में शामिल हैं, जिसमें “Cockroach Janta Party” से जुड़ी गतिविधियां भी शामिल हैं।

यह याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड राजेश सिंह चौहान के माध्यम से दायर की गई।

Case Title – Raja Choudhary v. Union of India

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